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नज़्म
बहुत मैं ने भी की हैं दीदा-ए-पुर-ख़ूँ की तफ़्सीरें
मगर ये दामन-ए-तर क्या करूँ गुलशन नहीं बनता
उबैदुर्रहमान आज़मी
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ज़िया-ए-ख़ामोश के सुकूत-आश्ना तरन्नुम में घुल रहा है
कि उक़्दा-ए-गेसू-ए-शब-ए-तार खुल रहा है
कृष्ण मोहन
नज़्म
वाक़िफ़-ए-अटलांटिक थी बे-नियाज़-ए-ख़ुश्क-ओ-तर
मैं ने स्टेटस की ख़ातिर कर तो ली शादी मगर
खालिद इरफ़ान
नज़्म
है बहर-ए-इल्म तेरी रवानी से सर-बसर
दामान-ओ-जेब-ए-उर्दू-ओ-हिन्दी हैं पुर-गुहर