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नज़्म
ये इज़्ज़त बोझ है शायद
जहाँ पर दब गई हूँ मैं
हर इक शब जागते गुज़री
कि सोने कब गई हूँ मैं
माहम शाह
नज़्म
शाही दरबारों के दर से फ़ौजी पहरे ख़त्म हुए हैं
ज़ाती जागीरों के हक़ और मोहमल दा'वे ख़त्म हुए हैं