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नज़्म
मेरे माज़ी को अंधेरे में दबा रहने दो
मेरा माज़ी मिरी ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
देख कर तेरे सितम ऐ हामी-ए-अम्न-ओ-अमाँ
गुर्ग रह जाते हैं दाँतों में दबा कर उँगलियाँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
जगमगा उठती है दुनिया-ए-तख़य्युल जिस से
दिल में वो शोला-ए-जाँ-सोज़ दबा रक्खा है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ये तो हैं फ़ित्ना-ए-बेदार दबा दो इन को
ये मिटा देंगे तमद्दुन को मिटा दो इन को
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
किसी मग़रूर की गर्दन पे होता बोझ एहसाँ का
किसी ज़ालिम के दिल में दर्द हो कर ला-दवा होता
जमील मज़हरी
नज़्म
वो पूछे गर कहाँ से किस तरह आया है ये हलवा
तो डब्बा पेश कर के कह दिया इस का है सब जल्वा