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नज़्म
जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
हर ख़ातिर को ख़ुरसंद किया हर दिल को लुभाया होली ने
दफ़ रंगीं नक़्श सुनहरी का जिस वक़्त बजाया होली ने
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
इक तरफ़ बजती हैं जोश-ए-ज़ीस्त की शहनाइयाँ
इक तरफ़ चिंघाड़ते हैं अहरमन के तब्ल-ओ-दफ़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
दफ़ बजते हैं सब हँसते हैं और धूम है बिल्कुल
होली की ख़ुशी में तो न कर हम से तग़ाफ़ुल
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मय निकली जाम गुलाबी कुछ लहक लहक कुछ छलक छलक
हर चार तरफ़ ख़ुश-वक़्ती से दफ़ बाजे रंग और रंग होई
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
सरोद-ओ-नग़्मा, अदब, शेर, अम्न, बर्बादी
जनाज़ा इश्क़ का, दफ़ की सदाएँ, मुर्दा ख़याल
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
इस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहीं
दाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहीं