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नज़्म
नहीं है तेरे तख़य्युल में फ़ित्ना-ए-तहक़ीक़
हैं तेरे जहल पे क़ुर्बान नुक्ता-हाए-दक़ीक़
मयकश अकबराबादी
नज़्म
फिर सियासत छोड़ कर दाख़िल हिसार-ए-दीं में हो
मुल्क-ओ-दौलत है फ़क़त हिफ्ज़-ए-हरम का इक समर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मैं कि मायूसी मिरी फ़ितरत में दाख़िल हो चुकी
जब्र भी ख़ुद पर करूँ तो गुनगुना सकता नहीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
उत्तर दक्खिन पूरब पच्छिम हर सम्त से इक चीख़ आती है
नौ-ए-इंसाँ काँधों पे लिए गाँधी की अर्थी जाती है
आनंद नारायण मुल्ला
नज़्म
ऊँचे दर से दाख़िल हो कर साफ़ नशेब में बैठे जा कर
एक मक़ाम में हुए इकट्ठे रौनक़ और वीरानी आ कर
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
ये अगर जन्नत में दाख़िल हो गए सिर्फ़ एक बार
फिर कहाँ जाएँगे हम जैसे शहीद-ए-हक़-शिआर