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नज़्म
मुब्तला पेच में हैं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की तरह
दर पे लटके हैं बशर ख़ार-ए-मुग़ीलाँ की तरह
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
है दश्त अब भी दश्त मगर ख़ून-ए-पा से 'फ़ैज़'
सैराब चंद ख़ार-ए-मुग़ीलाँ हुए तो हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
हूँ गुल-ए-तर कोई या ख़ार-ए-मुग़ीलाँ हूँ मैं
दर्द-ए-सर हूँ कि किसी दर्द का दरमाँ हूँ मैं
ख्वाजा मंज़र हसन मंज़र
नज़्म
पा-फ़िगारान-ए-जुनूँ को न हिदायत देना
कू-ब-कू ख़ार-ए-मुग़ीलाँ है तुम्हारा क्या है