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नज़्म
ये क़ुर्ब-ए-रूह भी कितना 'अजब मु'अम्मा है
सुकून-ए-दिल भी है और दर्द-ए-बे-मुदावा है
बनो ताहिरा सईद
नज़्म
शीशा-ए-मह से छलक कर मय-ए-तुंद-ओ-बे-दर्द
उस के माथे से चुरा लेती है सोने की डलक
मुख़्तार सिद्दीक़ी
नज़्म
हम ने तो दोनों को देखा दोनों ही बे-दर्द कठोर
धरती वाला अंबर वाला पहला चाँद और दूजा चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
कहाँ तक साँस की डोरी से रिश्ते झूट के बाँधें
किसी के पंजा-ए-बे-दर्द ही से टूट जाने दो