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नज़्म
सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला' देखा
सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं
गुलज़ार
नज़्म
मगर कोई मुसलसल दिल पे इक दस्तक दिए जाता था कहता था मुसाफ़िर!
इस क़दर ना-मुतमइन रहने से क्या होगा