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नज़्म
मुद्द'ई 'इश्क़-ए-हक़ीक़ी का ये रहता है मगर
दौलत-ए-हुस्न-ए-मजाज़ी का ख़रीदार भी है
सय्यद वहीदुद्दीन सलीम
नज़्म
पाओं छूने सब बुज़ुर्गों के सिखाती है उसे
है सर-ए-तस्लीम ही बस दौलत-ए-दुनिया-ओ-दीं
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
हम मु’अर्रा हो के इन औसाफ़ से पस्ती में हैं
दौलत-ए-‘इल्म-ओ-‘अमल खो कर तही-दस्ती में हैं
बर्क़ देहलवी
नज़्म
पत्थरों को ज़बाँ तो मिली पर तकल्लुम नहीं
पत्थरों को ख़द-ओ-ख़ाल-ए-इंसाँ मिले दौलत-ए-दर्द-ओ-ग़म कब मिली
वहीद अख़्तर
नज़्म
वा'दा-ए-क़ुर्ब ख़ुदा जाने वफ़ा हो कि न हो
वस्ल का सोच के ही जान पे बन आती है