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नज़्म
पहुँचता है हर इक मय-कश के आगे दौर-ए-जाम उस का
किसी को तिश्ना-लब रखता नहीं है लुत्फ़-ए-आम उस का
ज़फ़र अली ख़ाँ
नज़्म
बे-ख़ुदी के नाम पर जब दौर-ए-जाम-ए-बादा था
जब तजल्ली-ए-हक़ीक़त से हर इक दिल सादा था
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
हो गया मय-ख़ाना चौपट इक निगाह-ए-क़हर से
अब न वो साक़ी न मय है और न दौर-ए-जाम है
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
सीखना है लेकिन अब मय-ख़ाना-ए-तामीर में
जुम्बिश-ए-नब्ज़-ए-तमन्ना ओ ख़िराम-ए-दौर-ए-जाम
अर्श मलसियानी
नज़्म
दौर-ए-'अफ़लातून'-ओ-'तुलसी-दास' से 'इक़बाल' तक
हिस्ट्री कल शाइ'रों की इस कमेटी ने पढ़ी
रज़ा नक़वी वाही
नज़्म
हो अगर हाथों में तेरे ख़ामा-ए-मोजिज़ रक़म
शीशा-ए-दिल हो अगर तेरा मिसाल-ए-जाम-ए-जम