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नज़्म
जो आब-ओ-ताब है इस में कहाँ सूरज की ज़ौ में है
ये नख़्ल-ए-इश्क़ पर जैसे वफ़ा का बौर है जानाँ
नाज़ बट
नज़्म
फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूटी हों अफ़्साने हों
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
आज तो हम बिकने को आए, आज हमारे दाम लगा
यूसुफ़ तो बाज़ार-ए-वफ़ा में, एक टिके को बिकता है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
सोचते थे कि हो ना-वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-वफ़ा
तुम में तो तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का सलीक़ा भी नहीं
नसीम सय्यद
नज़्म
ऐ वफ़ा खुलते हैं तुझ पर आज क्या क्या राज़ देख
चल चमन में बुलबुल-ओ-गुल के नियाज़-ओ-नाज़ देख