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नज़्म
सो मैं ने साहत-ए-दीरोज़ में डाला है अब डेरा
मिरे दीरोज़ में ज़हर-ए-हलाहल तेग़-ए-क़ातिल है
जौन एलिया
नज़्म
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
हर मंज़िल में अब साथ तिरे ये जितना डेरा-डांडा है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
घर में ख़ामोशी का डेरा माँ तिरे जाने के बा'द
दम घुटा जाता है मेरा माँ तिरे जाने के बा'द
शहनाज़ परवीन शाज़ी
नज़्म
उफ़ुक़ पर ज़िंदगी के लश्कर-ए-ज़ुल्मत का डेरा है
हवादिस के क़यामत-ख़ेज़ तूफ़ानों ने घेरा है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अक़्ल के मैदान में ज़ुल्मत का डेरा ही रहा
दिल में तारीकी दिमाग़ों में अँधेरा ही रहा
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
उठ गया ज़ुल्मात का डेरा बढ़ा हर सम्त नूर
मम्बा'-ए-अनवार से फैलीं शुआएँ दूर दूर