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नज़्म
लाख कहो काला धन इस को बिन इस के दुनिया अँधियारी
सब रंग तमाशे इस से हैं इस से ही रौनक़ है सारी
सदा अम्बालवी
नज़्म
ढल चुकी रात बिखरने लगा तारों का ग़ुबार
लड़खड़ाने लगे ऐवानों में ख़्वाबीदा चराग़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
यूँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़
ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात