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नज़्म
दिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्दद
ब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब साज़-ए-अज़ल की फ़ुग़ाँ
जिस से दिखाती है ज़ात ज़ेर-ओ-बम-ए-मुम्किनात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दिखा दूँगा जहाँ को जो मिरी आँखों ने देखा है
तुझे भी सूरत-ए-आईना हैराँ कर के छोड़ूँगा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मा'सूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगा
हक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
सर पे रख सकता हूँ ताज-ए-किश्वर-ए-नूरानियाँ
महफ़िल-ए-ख़ुर्शीद को नीचा दिखा सकता हूँ मैं