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नज़्म
इक दिल-ए-शोला-ब-जाँ साथ लिए जाता हूँ
हर क़दम तू ने कभी अज़्म-ए-जवाँ बख़्शा था!
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
बारिश-ए-ख़ून-ए-दिल-ओ-जाँ से बुझा दी सर-ए-बज़्म
झूट की शम'-ए-फ़रोज़ाँ तिरे परवानों ने
मुस्लिम शमीम
नज़्म
अभी आज़ादी-ए-जिस्म-ओ-दिल-ओ-जाँ का तराना हम ने छेड़ा था
अभी कस ने तुम्हारे दिल पे फिर फूँका वही मंतर
अमीक़ हनफ़ी
नज़्म
अपनी क़िस्मत में लिखे हैं जो विरासत की तरह
आओ इक बार वो ज़ख़्म-ए-दिल-ओ-जाँ देख आएँ
क़ैसर-उल जाफ़री
नज़्म
फिर देखे हैं वो हिज्र के तपते हुए दिन भी
जब फ़िक्र-ए-दिल-ओ-जाँ में फ़ुग़ाँ भूल गई है