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नज़्म
तेरी मौज-ए-मुज़्तरिब है और दिल-ए-पुर-जोश है
या'नी बेताबी में उस का मुद्दआ' मिल जाएगा
साक़िब कानपुरी
नज़्म
सब जतन हैं ये मगर इक दिल-ए-पुर-ग़म के लिए
जम्अ' करती नहीं दौलत को मैं एटम के लिए
इज़हार मलीहाबादी
नज़्म
जिन में सुर्ख़ी दिल-ए-पुर-ख़ूँ की न सोज़ ओ तब-ओ-ताब
पर कोई नर्म सा जब राग सुना देते हैं
मुईन अहसन जज़्बी
नज़्म
दिल-ए-पुर-आरज़ू को शान-ए-मुस्तक़बिल का ख़्वाब आया
हर इक ज़र्रे की ख़लवत-गाह में ख़ुद आफ़्ताब आया
बिर्ज लाल रअना
नज़्म
वो दिल हूँ इबारत जो है नज़्म-ए-अबदी से
इक ख़ून का नुक़्ता हूँ मैं पुर-मअ'नी-ओ-पुर-जोश
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
आरिज़-ए-पुर-नूर झलका गेसु-ए-शब-रंग से
जू-ए-बार-ए-साज़-ए-दिल निकली सुकूत-ए-संग से