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नज़्म
जलील हश्मी
नज़्म
जो साहिल की ख़स्ता तमन्ना से टकरा रही हैं
हवाएँ पुराने ज़माने के कुछ राज़ दोहरा रही हैं
समीना राजा
नज़्म
(जानवर, तुम जानती हो, चीरते हैं, फाड़ते हैं!)
इस लिए अब तजरबा वो अपनी पक्की उम्र में दोहरा के ख़ुद
सत्यपाल आनंद
नज़्म
अज़म-ओ-इस्तिक़लाल के जौहर दिखाना हैं तुम्हें
अहद-ए-माज़ी की ज़रा दोहरा दो फिर से दास्ताँ