aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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तुम्हारी चश्म तवज्जोह के मुंतज़िर हैं अभीजिलौ में नग़मा-ओ-रंग-ओ-बहार-ओ-नूर लिएहयात गर्म-ए-तग-ओ-दौ है मैं नहीं तो क्या
मैं जब तिफ़्ल-ए-मकतब था, हर बात, हर फ़ल्सफ़ा जानता थाखड़े हो के मिम्बर पे पहरों सलातीन-ए-पारीन-ओ-हाज़िरहिकायात-ए-शीरीन-ओ-तल्ख़ उन की, उन के दरख़्शाँ जराएमजो सफ़्हात-ए-तारीख़ पर कारनामे हैं, उन के अवामिरनवाही, हकीमों के अक़वाल, दाना ख़तीबों के ख़ुत्बेजिन्हें मुस्तमंदों ने बाक़ी रक्खा उस का मख़्फ़ी ओ ज़ाहिरफ़ुनून-ए-लतीफ़ा ख़ुदावंद के हुक्म-नामे, फ़रामीनजिन्हें मस्ख़ करते रहे पीर-ज़ादे, जहाँ के अनासिरहर इक सख़्त मौज़ू पर इस तरह बोलता था कि मुझ कोसमुंदर समझते थे सब इल्म ओ फ़न का, हर इक मेरी ख़ातिरतग-ओ-दौ में रहता था, लेकिन यकायक हुआ क्या ये मुझ कोये महसूस होता है सोते से उट्ठा हूँ, हिलने से क़ासिरकिसी बहर के सूने साहिल पे बैठा हूँ गर्दन झुकाएसर-ए-शाम आई है देखो तो है आगही कितनी शातिर!
मुझे तो फ़ल्सफ़ा-ए-सब्र भी गवारा है(अगरचे अस्ल में ये क़ातिलों की मंतिक़ है)मगर ये फ़ल्सफ़ा उस दिल को कौन समझाएजो तेरी याद के ग़म को ख़ुदा समझता हैअगर गए हुए इक लम्हा मुड़ के आ सकतेफ़ना के ब'अद दोबारा हयात अगर होतीतो मैं ज़रूर लिपट कर तुम्हारे सीने सेतमाम क़िस्सा-ए-ग़म आँसुओं में बरसातामगर मुझे तो ख़बर है कि ये नहीं मुमकिनइसी लिए मिरे दिल में अलम भी बाक़ी हैतिरी जिहाद-ए-मुसलसल सी ज़िंदगी की किताबमिरी हयात के इक इक वरक़ पे लिक्खी हैजो तू ने राह में छोड़ा था परचम-ए-तग-ओ-दौहरीफ़ कुछ भी कहें आज मेरे हाथ में हैक़रार-ए-ख़ातिर-ए-महज़ूँ अगर कोई शय हैतो उसी का ख़याल!
तमाशा-गह-ए-लाला-ज़ारउरूस-ए-जवाँ साल-ए-फ़र्दा हिजाबों में मस्तूरगुर्सिना निगह ज़ूद-कारों से रंजूरमगर अब हमारे नए ख़्वाब काबूस-ए-माज़ी नहीं हैंहमारे नए ख़्वाब हैं आदम-ए-नौ के ख़्वाबजहान-ए-तग-ओ-दौ के ख़्वाबजहान-ए-तग-ओ-दौ मदाइन नहींकाख़-ए-फ़ग़्फ़ूर-ओ-किसरा नहींये उस आदम-ए-नौ का मआवा नहींनई बस्तियाँ और नए शहरयारतमाशा-गह-ए-लाला-ज़ार!
पर मंज़र-ए-ग़ुरूब बहुत दिल-नशीं है क्यूँमग़रिब की शाम अपनी सहर से हसीं है क्यूँइस कश्मकश में दौलत-ए-उक़्बा भी छिन गईज़ौक़-ए-जुनूँ से वुसअ'त-ए-सहरा भी छिन गईसहरा-ए-आरज़ू में तग-ओ-दौ नहीं रहीपा-ए-तलब से वादी-ए-सीना भी छिन गईतू ने तो क़र्तबा में नमाज़ें भी कीं अदाअपनी जबीं से मस्जिद-ए-अक़्सा भी छिन गईकोहसार रौंद डाले गए खेत हो गएचट्टान हम ज़रूर थे अब रेत हो गएमंज़िल पे आ के लुट गए हम रहबरों के साथबीमार भी पड़े हैं तो चारागरों के साथग़ुर्बत-कदे में काश उतर आए कहकशाँआँखें फ़लक की सम्त हैं बोझल सरों के साथउड़ना मुहाल लौट के आना भी है वबालज़ख़्मी दुआ ख़ला में है टूटे परों के साथइस रज़्म-ए-ख़ैर-ओ-शर में हुआ कौन सुरख़-रूज़र्ब-ए-कलीम कुंद है फ़िरऔन सुर्ख़-रू
दोस्त रुख़्सत हो गएउन से मुलाक़ातें गईं बातें गईंशहर था आबाद जिन के दम-क़दम सेवो हमारी चाँदनी रातें गईंमरने वाले मर गएज़िंदा मगर हम भी नहींवो तो ग़ुस्ल-ए-आख़िरी ले कर हुए फिर ताज़गी से आश्नानिथरे सुथरे ओढ़ कर अपनी सफ़ेदी के कफ़नकाफ़ूर की ख़ुशबू को नथुनों में समाएसो गए आराम से ठंडे बदनअपनी अपनी क़ब्र पर तकिया किएवो थकन की इस मुसलसल सरसराहट से तो अब आज़ाद हैंसाँस की ज़ंजीर से लटके हुएजागते रहने की काविश और लगनइस तग-ओ-दौ से परे आबाद हैंऔर हमजो इस किनारे पर खड़ेरोज़-ओ-शब लहरों का करते हैं शुमारआप-बीती रोज़ सुनते हैंमगर ख़ामोश हैंख़ामुशी से बहता पानीरोज़ बहता देखते हैंडूब जाने की मगर हिम्मत नहींकौन जाने डूब ही जाएँ कहींडूब जाओ या चले आओ इधरबाज़ आओ और फिर ज़िंदा रहोसातवाँ दर भी खुला है मुंतज़िरदाग़-ए-हिजरत दे गए ख़ुशबू के फूलकौन अब बन कर चराग़-ए-राह तुम कोहाथ से उँगली पकड़ करतिफ़्ल-ए-मकतब की तरह ले कर बढ़ेऔर ये कहेमौत का लम्हा हमारी ज़िंदगी का आ गयाजिस्म की ठंडक तो दस्तक दे रही हैआओ कुछ बातें करेंऔर फिर चलेंदोस्त रुख़्सत हो गए
अहद-ए-कुहन गुज़र गया लम्हा-ए-नौ अज़ीम हैआज का सेहर बे-बदल आज की लौ अज़ीम हैइत्र की रूह में बसी अस्र के रूप में रचीफूटती पौ अज़ीम है ये तग-ओ-दौ अज़ीम हैबहर-ए-जदीद औज मौज इस में गुहर हैं मौज मौजसत्ह-ब-सत्ह सब सदफ़ नूर की रौ अज़ीम हैताज़ा तरीन ये जहाँ ताज़ा नुजूम व आसमाँउन की झलक जुदा जुदा उन का जिलौ अज़ीम हैऔर है इस की ताब-ओ-तब और है चाल और छबजो ख़द-ओ-ख़ाल हों सो हों आइना तो अज़ीम है
एक ऐसे सर्वे के मुताबिक़जो मेरे दोस्तअपने दिल को मौसूल होने वालीग़ैर-ज़रूरी ख़बरों को जम्अ कर केमुरत्तब कर रहे हैंशहर में कोई ख़ुद-कुशी नहीं कर रहामोहब्बत में नाकामी पर फ़ीनाइल पीने वाली लड़कियाँऔर नौकरी न मिलने परबड़े भाई के लाइसेंस-याफ़ता पिस्तौल सेख़ुद-कुशी करने वाले लड़केबहुत दिन से नज़र नहीं आएदुपट्टे का फंदा बना कर मर जाने वालीबे-औलाद दुल्हनेंऔर तवील बीमारी से तंग आ करख़ुद को जला कर हलाक करने वालेउधेड़-उम्र मरीज़नापैद हो गए हैंशहर में अब जिस को भी ख़ुद-कुशी करनी होउसे बहुत ज़ियादा तग-ओ-दौ नहीं करनी पड़तीवो बाहर निकलता हैऔर थोड़ी देर के लिएनिशाना-बाज़ों वाली येलो कैब काइंतिज़ार करता हैया जब उस की सड़क के दोनों तरफ़ख़ूब फायरिंग हो रही होवो बिला-इरादा बॉलकनी में जा के खड़ा हो जाता हैजब लोग ख़ुद-कुशी करना चाहते हैंयक़ीन कीजिएकिसी जिंसी इम्तियाज़ के बग़ैररंग, नस्ल और ज़बान के फ़र्क़ को ख़ातिर में न लाते हुएगोलियाँ हर जगहउन्हें ढूँढ निकालती हैं
बजाए कोई सर-बर-आवुर्दा पत्थर-सिफ़त शख़्सियत चाहने केतुम्हारी मइय्यत रिफ़ाक़त-ए-तग-ओ-दौ का अंदाज़ मांगों
फैली है फ़ज़ाओं में ख़ुशी मेरी नज़र कीहँसती नज़र आती हैं फ़ज़ाएँ मिरे घर कीदिल-शाद मिरे अहल-ओ-अयाल आज बहुत हैंमसरूफ़ हैं वो भी नहीं मसरूफ़ फ़क़त मैंरखी है सलीक़े से हर इक काम की चीज़ आजमेहमान मिरे घर में हैं कुछ मेरे अज़ीज़ आजशादी का मकाँ घर मिरा मालूम न हो क्यूँमजमा' हो जब इतना तो भला धूम न हो क्यूँभाई भी हैं बहनोई भी भावज भी बहन भीबैठा है भतीजा भी भतीजे की दुल्हन भीबच्ची इधर इक बैठ के तकती है दुल्हन कोकुछ तिफ़्ल सताते हैं उधर अपनी बहन कोबच्चों पे झलक ख़ास है तनवीर-ए-सहर कीउठ बैठे हैं सब सुनते ही आवाज़ गजर कीदिलकश ये फ़ज़ा सुब्ह की ये नूर का तड़काबुलबुल की तरह बोल रहा है कोई लड़काबे-वज्ह कोई रोने पे आमादा हुआ हैहैरत से नए गुर को कोई देख रहा हैबैठा है ये चुप दौड़ रहा है वो ख़ुशी सेखाने के लिए ज़िद कोई करता है अभी सेकरना है जो सामान-ए-ज़ियाफ़त को फ़राहमआ आ के मिरे कान में कुछ कहती हैं बेगमहोना है जो ख़ूबी से ज़ियाफ़त का सर-अंजामलड़की के ज़रिए से भी पहुँचाती हैं पैग़ामआती भी हैं जाती भी हैं बेगम सू-ए-मतबख़मामाओं में बे-वक़्त जहाँ होती है चख़ चख़राहत न मिले क्यूँ उन्हें हल्की तग-ओ-दौ मेंसाए की तरह साथ है लड़की भी जिलौ मेंनन्ही अभी उट्ठी नहीं पहलू से फुफी केलेती हैं वो रह रह के मज़े उस की हँसी केलड़के मिरे ख़ुश हो के उधर देख रहे हैंइख़्लास-ओ-मोहब्बत से मुख़ातिब हूँ जिधर मैंमजमा' ये अज़ीज़ों का मोहब्बत की ये बातेंइन प्यार की बातों में न चोटें हैं न घातेंअनवार तबस्सुम के तकल्लुम से हैं पैदाज़ौ सुब्ह की इस मंज़र-ए-दिल-कश पे है शैदाबातों का अभी था तरबी सिलसिला जारीनर्गिस ने कहा आ के है तय्यार नहारी
आज मैं दूर बहुत दूर निकल आया हूँबे-तलब तग-ओ-दौदिल में काविश न तलाशन कोई ख़्वाहिश मख़्फ़ी न तमन्ना-ए-मआ'शहवस-ए-ख़ाम न सौदा-ए-तमामयूँही चलता हुआ चलता हुआ आ पहुँचा हूँपै-ब-पै गाम-ब-गामकिस क़दर दूर निकल आया हूँउस से पहले भी चला हूँ मैं नई राहों परशाह-राहों से परेख़ार-ज़ारों में घिसटती हुई इक सुर्ख़ लकीरइक सिसकती हुई दिल-दोज़ नफ़ीरसरसराते हुए मल्बूसमहकती हुई साँसलज़्ज़त-ओ-कर्ब का मद्धम बम-ओ-ज़ेरआज लेकिन मैं बहुत दूर निकल आया हूँऔर इक शाम सर-ए-राहगुज़ारवो मिरी लग़्ज़िश-ए-पा मेरी वो बे-राह-रवीख़ुद-फ़रामोश सुबुक-दोश-ए-अमलअपने अज्दाद के ना-कर्दा गुनाहों की उक़ूबत से बरीइक हिरन चौकड़ी भरता हुआ ख़ामोश-ख़िरामशाम के वक़्त सर-ए-राहगुज़ारमैं बहुत दूर भटक निकला थाआज लेकिन मैं बहुत दूर निकल आया हूँआप से आप बहुत दूर बहुत दूर निकल आया हूँशाह-राहों से परे दूर गुज़रगाहों सेबे-तलब बे-तग-ओ-दौख़ानक़ाहों से अलग दौर सनम-ख़ानों सेहवस-ए-ख़ाम न सौदा-ए-तमामयूँही चलता हुआ चलता हुआ आ पहुँचा हूँपै-ब-पै गाम-ब-गामकिस क़दर दूर बहुत दूर निकल आया हूँ
मैं सोच के इक दोराहे परहैराँ आज़ुर्दा आ पहुँचाये सारी तग-ओ-दौ तन्हा थीइस मोड़ पे भी तन्हा पहुँचालेकिन इस तन्हा मंज़र मेंइक चेहरा और उभर आयाजो साफ़ नज़र आया न कभीअब इतने क़रीब नज़र आयावो चेहरा दुश्मन का चेहराइस रूप में पहली बार मिलाकभी ज़ात के हर मंज़र में मिरेकभी मंज़र के उस पार मिलामैं ख़ूब उसे पहचान गयाजिस रूप में वो जिस बार मिलाफिर अपने दिल पे नज़र जो कीआमादा पए-पैकार मिलाफिर मैं ने किसी ताख़ीर बिनाइक वार बहुत सफ़्फ़ाक कियाख़ुद अपना गरेबाँ चाक किया
ज़ाहिद-ए-बे-रिया बना है कोईऔर बना कोई रिंद-ए-शातिर हैहै तग-ओ-दौ जहाँ में जितनी भीसिर्फ़ इक चीज़ ही की ख़ातिर है
मिरे इस शहर की रौनक़बसें रिक्शा ट्रामें मोटरेंऔर आदमी सैलाब के मानिंदसड़कें हमहमाती शोर हंगामा तग-ओ-दौवक़्त की गर्दिश में सुब्ह-ओ-शाम का मा'मूल हैमिरे इस शहर की रौनक़स्कूल ना-आश्ना लम्हे अधूरी ख़्वाहिशख़्वाबों के वीरानेअँधेरे शब के अफ़्सानेमिरे इस शहर की रौनक़हसीं बाज़ार रौनक़ दुकानें दिलरुबा चेहरेशगुफ़्ता कोंपलें आसूदा जल्वेकर्ब की लहरेंये कैसी कर्ब की लहरें हैं यारबशहर-ए-ख़ूबाँ शहर-ए-मक़्तल बन गया हैऔर ज़िंदा आदमीक़त्ल-गाह-ए-रह-गुज़र पररिक्शों' बसों कारों के शोर-ए-गराँ मेंनीम-जाँ बेहाल मुर्दाखो चुका हैए'तिबार-ए-ज़िंदगी
ज़िंदगी जिस्म-ओ-दिल-ओ-जाँ की मुनज़्ज़म क़ुव्वतमौत इज़हार परेशानी-ओ-लाचारी कामौत सहराओं में बिखरे हुए ज़र्रों का ग़ुबारज़िंदगी नक़्श उन्ही ज़र्रों की चमन-कारी कामौत बे-माएगी दामान-ए-ज़मीं की गोयाज़िंदगी सिलसिला बादल की गुहर-बारी काज़िंदगी क़ाफ़िला-ए-सई की पैहम तग-ओ-दौमौत दम भर के लिए वक़्फ़ा है बेकारी काज़िंदगी का जिसे मालूम हो मतलब उस कोमौत का ख़ौफ़ न गर्दूं की तबह-कारी का
पहाड़ी के उस पार कोई धनक है नहीं हैधनक के सिरे पर कोई जादू-नगरी परिस्ताँ ख़ज़ाना मिरा मुंतज़िर हैनहीं हैमुझे कोई धोका नहीं हैसमुंदर के उस पार से आने वाली हवाओं में कोई संदेसा नहीं हैअगर कुछ नहीं है तो सारी तग-ओ-दौ ये इमरोज़-ओ-फ़र्दा के सब सिलसिले किस लिए हैंउफ़ुक़ से परे मर्ग़-ज़ारों की आख़िर हदों तक पहुँचने की ख़्वाहिशसराबों के धुँदले हयूलों का पीछाये सब किस लिए हैकिसी ख़्वाब की कोई सूरत नहीं हैख़ुशी कोई तोहफ़ा नहीं जो क्रिसमस की शब कोई चुपके से दे जाएगामैं एलिस नहीं हूँ अलिफ़-लैलवी शाहज़ादी नहीं हूँमैं 'अज़रा' हूँऔर मेरे और ज़िंदगी के तअ'ल्लुक़ से जो भी है दुनिया में वो असलियत हैमिरी शाइ'री गीत संगीतसब दिल के मौसमचाहने चाहे जाने की ख़्वाहिश में रिश्तों की संगीनियाँकुछ रिफ़ाक़त के अनमोल मोतीमोहब्बत की शबनम में डूबी हुई अध-खिली ज़र्द कलियाँबुज़ुर्गों से पाई हुई सब मुक़द्दस दुआएँज़िंदगानी की सब धूप छाँवख़ज़ाना है मेराधनक-रंग मुझ में समाए हुए हैं
ब-ज़ाहिर है सुबुक रफ़्तार-ओ-कमज़ोरग़नीम-ए-शौक़ हो मद्द-ए-मुक़ाबिलतो उस का हर-नफ़स आतिश-फ़िशाँ हैहै यूँ तो ज़िंदगी कितनी सुबुक-रौअजब इक एक लम्हे की तग-ओ-दौये इक लम्हा गुज़रता ही नहीं हैमगर जब इस नज़र के सामने सेगुज़रती है ख़िरद बिजली की सूरतदिखा कर इक अनोखा सा करिश्मातो यूँ महसूस होता है कि जैसेज़माना कितना आगे जा चुका है
मौत इक ख़्वाब है अज्ज़ा-ए-बदन का हमदमज़िंदगी नाम है एहसास की बेदारी कामौत जिस रह-गुज़र-ए-शौक़ में रहज़न का नक़ाबज़िंदगी रख़्त इसी राह-ए-तलब-गारी काज़िंदगी जिस्म-ओ-दिल-ओ-जाँ की मुनज़्ज़म क़ुव्वतमौत इज़हार परेशानी-ओ-लाचारी कामौत सहराओं में बिखरे हुए ज़र्रों का ग़ुबारज़िंदगी नक़्श उन्ही ज़र्रों की चमन कारी कामौत बे-माएगी दामान-ए-ज़मीं की गोयाज़िंदगी सिलसिला बादल की गुहर-बारी काज़िंदगी क़ाफ़िला-ए-सई की पैहम तग-ओ-दौमौत दम-भर के लिए वक़्फ़ा है बेकारी काज़िंदगी का जिसे मा'लूम हो मतलब उस कोमौत का ख़ौफ़ न गर्दूं की तबह-कारी का
वक़्त की भटकी हुई अर्वाह का नौहा हूँ मैंरेत की अलवाह पर कुंदा कोई मदफ़ून दिनमदक़ूक़ दिनबे-सराहत ख़्वाब की तफ़्हीम मेंहैरान ओ सरगर्दां हूँ मैंअपने अंदरइक अज़ा-ख़ाना सजाने की तग-ओ-दौरोज़ इक दीवार-ए-गिर्या को उठाने की मशक़्क़तऔर पस-ए-दीवार जाने की तग-ओ-दौ
साजिदादर्द के रास्तों परकब से महव-ए-सफ़र होतुम ने इन रहगुज़ारों की बंजर ज़मीं मेंकितने रफ़्तार-ओ-गुफ़्तार के गुल खिलाएइस अक़ूबत-कदा की सियाही मेंकितने चराग़-ए-तमन्ना जलाएसाजिदाइस तग-ओ-दौ से तुम नेक्या कभी चेहरा-ए-ज़िंदगी को सँवाराक्या किसी दिल में कोई सितारा उताराक्या ज़माने की रफ़्तार बदलीक्या किसी तपते सहरा के ज़र्रों को कुंदन बनायाकितने ज़ख़्मों पे इंसाँ के मरहम लगायाज़ुल्म की दास्ताँ को कभी हर्फ़-ए-शीरीं बनाया
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