aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "du.aa-e-KHair"
मेरी तमाम काएनातघास के वरक़ की तरह सूखने लगेतो तुम इस तन्हा रस्ते पे आओगे?तख़्लीक़ के चुप मालिक! आक़ा! ख़ुदा!तुम कि खोए होऊँ के दर्द मुद्दतों सँभाले रहे होउस रस्ते पे कि जहाँमुझे कभी यक़ीं न हो सका कि पानी माँगूँ तो कैसेरोटी या आफ़ियत या महज़ पहचान की भीक माँगूँ तो कैसेतुम आओगे?जले हुए जिस्म के इस रस्ते पे?मौत के दूसरे साहिल पेधुएँ की तरह पाश पाश बूढ़ी हड्डियों कीइस सर-ज़मीन पे?यहाँ बे-नुत्क़ लफ़्ज़ एक दूसरे का मुँह तकते हैंऔर हर दुआ ने लफ़्ज़ों से मुँह मोड़ लिया है
तू शाह मिरे लफ़्ज़ों का हैतू हुस्न है मेरी नज़्मों कामैं पागल तेरी चाहत मेंसाईं मैं कितनी घायल हूँतुम देखो मेरी आँखों मेंहो तुम ही मेरे अश्कों मेंमैं मन के भेद बताऊँ क्याकिस तरह प्यार छुपाऊँ मैंमैं लाख छुपाऊँ दुनिया सेआँखों में सब आ जाता हैतू दिल से मुझे दुआएँ देतुझ पे निछावर मेरी वफ़ाएँप्यार की ख़ुशबू मन में बसी हैप्यास तो लेकिन लब पे सजी हैइसे निकालूँ मन से कैसेतुझे निकालूँ तन से कैसेख़्वाब की किरची चुभती जाएअश्क मिरे रुख़्सार पे आएटूट गया मिन्नत का धागामन मेरा है कितना अभागाख़्वाब की आस में खोया सब कुछडूब गया है प्यास में सब कुछआँखों में वीरानी उतरीचेहरे पर हैरानी उतरीकैसे मनाऊँ मातम साईंबोल नाँ मेरे हमदम साईंदे दे साईं मुझ को दुआ तूया तो आकर ख़ुद दफ़ना तू
तुम भी करोगी फिर महसूसप्यार भरे लम्हों को 'दुआ'मैं ने जवाबन उस से कहासुनो सुनो तुम मेरी बातप्यार की सुंदर बातों मेंक़िस्से और कहानी मेंदिल सारे आ जाते हैंगुज़रे हुए लम्हे सारेलौट के फिर नहीं आते हैंफिर मुझ से वो कहने लगाएक अलग ही मंज़र हैइन की नज़्मों के अंदररंग-बिरंगी इक दुनियाहै इन नज़्मों में आबादमैं ने कहा उस से लेकिनइन की नज़्मों से मेराक्या लेना क्या देना हैमेरे लिए तुम सब कुछ होइन के क़िस्से रहने दोमत ही सुनाओ तुम मुझ कोतुम ख़ुद भी इक शाइ'र होमेरे बारे में तुम नेकोई नज़्म लिखी है क्याकहने लगा ये सुन कर वोहाँ लिक्खी तो है इक नज़्ममैं ने तुम्हारे बारे मेंजिस में तुम्हारी आँखों काइक ख़ुश-रंग हवाला हैजिस में तुम्हारे और मेरेप्यार की मधुर कहानी हैमैं ने कहा मेरे शाइ'र
मैं उदास हूँ ज़रा देख तोतू नज़र नज़र से मिला कभीमिरे दिल के शाह तू सुन ज़राइक उदासी मुझ पे मुहीत हैहुईं मुद्दतें मिरे दिलरुबातिरे प्यारे बोल सुने हुएमिरे कान देख तरस गएमैं तलब-गुज़ार-ए-'दुआ' तिरीमिरे दिल के शाह तू सुन ज़रा
मेरी आँखों में इक रौशनी जैसे भरने लगीऔर मैं आप के बाज़ुओं में पनाहढूँडने लग गईआप के लम्स से आप की साँस सेमिरी सोचों में भीइक महक सी उतरने लगीमिरी पलकों पे ख़ुशियों के सौ दीप जलने लगेऔर फिर आप मेरे तख़य्युल मेंभरने को रंग आ गएरोज़-ए-रौशन की मानिंदअब ये यक़ीं हो चला था मुझेआप मुझ में सरायतइस अंदाज़ से कर चुके हैंमैं उस वक़्त अनमोल शय हो गई थीऔर आख़िर 'दुआ'इस मोहब्बत को मैंइक मुक़द्दस सहीफ़ा समझते हुएआप को चाहने लग गई
हर घड़ी वहशतेंदिल मिरा बद-गुमाँबे-हिसी दर्द कीफ़स्ल-ए-ग़म क्या लिखूँरूनुमा हादिसाआँख से रूह तकदर्द की जस्त हैये बदन रूठ करआग में डाल करआख़िरी हद तलकआन पहुँची हूँ मैंये कहानी है औरइस कहानी में हैहर दुआ मुंतशिर
ख़ैर अब हम मुतमइन यूँ हैं कि जान-ए-आरज़ूहम ने कुछ खो भी दिया है और कुछ पाया भी हैकैसे कैसे अक़्ल को दे कर दिलासे जान-ए-जाँरूह को तस्कीन दी है दिल को समझाया भी है
सद हज़ार बातें थींहीला-ए-शकेबाईसूरतों की ज़ेबाईकामतों की रानाईइन सियाह रातों मेंएक भी न याद आईजा-ब-जा भटकते हैंकिस की राह तकते हैंचाँद के तमन्नाईये नगर कभी पहलेइस क़दर न वीराँ थाकहने वाले कहते हैंक़र्या-ए-निगाराँ थाख़ैर अपने जीने काये भी एक सामाँ था
शहर-ए-दिल की गलियों मेंशाम से भटकते हैंचाँद के तमन्नाईबे-क़रार सौदाईदिल-गुदाज़ तारीकीजाँ-गुदाज़ तन्हाईरूह-ओ-जाँ को डसती हैरूह-ओ-जाँ में बस्ती हैशहर-ए-दिल की गलियों मेंताक शब की बेलों परशबनमीं सरिश्कों कीबे-क़रार लोगों नेबे-शुमार लोगों नेयादगार छोड़ी हैइतनी बात थोड़ी हैसद-हज़ार बातें थींहीला-ए-शकेबाईसूरतों की ज़ेबाईकामतों की रा'नाईउन सियाह रातों मेंएक भी न याद आईजा-ब-जा भटकते हैंकिस की राह तकते हैंचाँद के तमन्नाईये नगर कभी पहलेइस क़दर न वीराँ थाकहने वाले कहते हैंक़र्या-ए-निगाराँ थाख़ैर अपने जीने काये भी एक सामाँ थाआज दिल में वीरानीअब्र बन के घिर आईआज दिल को क्या कहिएबा-वफ़ा न हरजाईफिर भी लोग दीवानेआ गए हैं समझानेअपनी वहशत-ए-दिल केबुन लिए हैं अफ़्सानेख़ुश-ख़याल दुनिया नेगर्मियाँ तो जाती हैंवो रुतें भी आती हैंजब मलूल रातों मेंदोस्तों की बातों मेंजी न चैन पाएगाऔर ऊब जाएगाआहटों से गूँजेगीशहर-ए-दिल की पिन्हाईऔर चाँद-रातों मेंचाँदनी के शैदाईहर बहाने निकलेंगेआरज़ू की गीराईढूँडने को रुस्वाईसर्द सर्द रातों कोज़र्द चाँद बख़्शेगाबे-हिसाब तन्हाईबे-हिजाब तन्हाईशहर-ए-दिल की गलियों में
फैलता फैलता शाम-ए-ग़म का धुआँइक उदासी का तनता हुआ साएबाँऊँचे ऊँचे मिनारों के सर पे रवाँदेख पहुँचा है आख़िर कहाँ से कहाँझाँकता सूरत-ए-ख़ैल-ए-आवारगाँग़ुर्फ़ा ग़ुर्फ़ा बहर काख़-ओ-कू शहर में
ऐ मतवालो नाक़ों वालो देते हो कुछ उस का पतानज्द के अंदर मजनूँ नामी एक हमारा भाई थाआख़िर उस पर क्या कुछ बीती जानो तो अहवाल कहोमौत मिली या लैला पाई? दीवाने का मआल कहोअक़्ल की बातें कहने वाले दोस्तों ने उसे समझायाउस को तो लेकिन चुप सी लगी थी ना बोला ना बाज़ आयाख़ैर अब उस की बात को छोड़ो दीवाना फिर दीवानाजाते जाते हम लोगों का एक संदेसा ले जाना
फटी फटी सी निगाहों से तक रहे थे सभीनसें तनी थीं रग-ए-जाँ फड़क रही थीअचानक दिलों की धड़कनेंसर में धमकने लगती थींक़ुतुब-नुमा न कोई बाद-नुमा और न मुर्ग़-ए-बाद-नुमाहवाएँ आँधियाँ तूफ़ान बर्फ़-ओ-बाराँतमाम अहल-ए-सिफ़त अश्क-शोई करते रहेवो 'आरिफ़ाना तजाहुलदु'आ-ए-ख़ैरख़ुद-कुशी थी कि दानिस्ता इख़्तिनाक़ अब किसे मा'लूमबता रहा है मगर आज का आसार फ़रोशसभी को ख़ौफ़ था इफ़शा-ए-राज़ का वर्नाअंधेरा धुल जातापुकारता कोई सिम-सिमतो दर भी खुल जाता
हुजूम जिस की ठोकरों की ज़र्ब सेहवा में हाँफता हुआ ग़ुबार छट नहीं रहाग़ुबार में जो ख़ाक है ज़मीन से उड़ी है याकिसी के सर्द जिस्म से ख़बर नहींख़बर भी हो तो क्या बिगाड़ ले कोईहुजूम हट नहीं रहाअबद की शाख़-ए-सब्ज़ पर खिला हुआशबाब का गुलाब पत्तियों में बट नहीं रहाहुजूम बे-सुकून है सवाल मर नहीं रहासवाल का ज़बान से जुड़ा हुआ जो तार हैवो तार कट नहीं रहाहुजूम हट नहीं रहावो मर गयाहुजूम उस की माँ की बद-दु'आ से डर नहीं रहाहुजूम उसे चटख़ती पसलियों के बल घसीटता चला गयाकिसी ने उस के ज़ख़्म को लुआब का कफ़न दियाकोई बदन को लाठियों से पीटता चला गयाक़रीब चंद लोग 'अक्स-बंद कर रहे हैंकैमरों में ऐसे खेल कोकि जिस में सब खिलाड़ियों की आस्तीं पे ख़ून हैहुजूम को जुनून है हुजूम हट नहीं रहामैं मुंतज़िर हूँ इक तरफ़मिरे अक़ब में चुप खड़ी है इक मुहाफ़िज़ों की सफ़हुजूम हट नहीं रहाहुजूम से कहो हटे ग़ुबार जाने कब छटेमैं उस के दर्द से भिंचे शिकस्ता हाथ की गिरफ़्त सेज़रा सी नज़्म खींच लूँमुहाफ़िज़ों का तर्जुमाँ दु'आ-ए-ख़ैर में मगननहीं नहीं वो पहले से रटा हुआ बयान रट नहीं रहामशाल ख़ान ख़ैर होतमाशा-गाह से तो राएगाँ पलट नहीं रहाहुजूम हट नहीं रहा
क़ुव्वत-ए-ख़ैर अता हो इतनीढीली शर की करें सब चूलें हम
ज़मीन-ज़ादियाँसना-ओ-हम्द की नमी से लब भिगो भिगोनहूसत-ओ-निगाह-ए-बदहसद की आग सेतहफ़्फ़ुज़-ओ-अमान-ओ-ख़ैर की दुआएँ माँगती हुईसुना रही हैं गीतकि कोई मुज़्दा-ए-ख़ुशा
हर रोज़ मैं ये करता हूँ दुआऐ मेरे ख़ुदा ऐ मेरे ख़ुदा
शहीदों का सरताज जन्नत-मक़ाममोहब्बत की मेराज ज़ी-एहतिरामग़ुलामान-ए-आलम की पुश्त-ओ-पनाहअहिंसा के बंदों की उम्मीद-दगाहवो ग़म भी वतन का था ग़म-ख़्वार भीरज़ाकार भी और सालार भीअहिंसा का पैरव मगर शेर-ए-मर्दमोहब्बत में यकता सदाक़त में फ़र्दहुआ जिस के दम से ब-सद एहतिशामसियासत से ऊँचा सदाक़त का नामवो आदम की अज़्मत का आईना-दारवो ज़र्रा कि चमका था ख़ुरशीद-दारवो जिस ने दिया आदमियत को औजवो जिस ने लड़ाई अहिंसा की फ़ौजक़फ़स है कोई अब न सय्याद हैवतन जिस की हिकमत से आज़ाद हैवो नूर-ए-ज़िया-बार सीमा-ए-ख़ैरवो जूया-ए-ख़ैर-ओ-शनासा-ए-ख़ैरफ़िरिश्ता-खिसाल-ओ-फ़रिश्ता-सियरमलक दर-हक़ीक़त ब-ज़ाहिर बशरमोहब्बत की वो इक शबीह-ए-हसींउख़ुव्वत का वो एक माह-ए-मुबींवो हक़ आगही की कछारों का शेरसदाक़त के मैदाँ का मर्द-ए-दिलेरफ़लक-आफ़रीं और गर्दूँ-तराज़मरीज़ान-ए-पस्ती का वो चारासाज़वो कोताह-बीनों की शम-ए-शुऊ'रवो गुमराहियों में हिदायत का नूरवो जिस ने उठाया ज़माने का बारकिया जिस ने जाबिर को बे-इख़्तियारवो बे-मिस्ल क़ाइद मुअस्सर ख़तीबवो लश्कर में जिस के अमीर-ओ-ग़रीबवो जिस ने करोड़ों के काटे हैं बंदवो अरफ़ा वो आ'ला वो सब से बुलंदवो जिस की अता है निराली अतावो जिस ने दिया इक नया फ़ल्सफ़ाज़मीं पर बहा उस जरी का लहूतफ़ोबर तू ऐ चर्ख़-ए-गर्दां तफ़ू
है यही इल्तिजा सुन हमारी दु'आऐ ख़ुदा ऐ ख़ुदा ऐ ख़ुदा ऐ ख़ुदा
कल शादी में तुम नईं आए ख़ैर तो हैअपनों को भी भूल गए हो ठीक तो हो
मिरी निगाह की ख़ुनुक उदासियाँ हैं हर तरफ़मिरे ख़याल की लकीर है वो रूद-ए-नूरकोह-ए-बर्फ़-पोश परमिरी दु’आ-ए-नीम-शब वो अब्र-ए-कोहसार है
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