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नज़्म
इक पटरी पर सर्दी में अपनी तक़दीर को रोए
दूजा ज़ुल्फ़ों की छाँव में सुख की सेज पे सोए
हबीब जालिब
नज़्म
कोई दूजा कर लूँ काम ऐसा वक़्त नहीं है
क्यूँकि कोई लम्हा तेरे प्यार से फ़ुर्सत नहीं है
प्रिया शंदिल्या
नज़्म
मगर एक ही रात का ज़ौक़ दरिया की वो लहर निकला
हसन कूज़ा-गर जिस में डूबा तो उभरा नहीं है!