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नज़्म
अहल-ए-दिल और भी हैं अहल-ए-वफ़ा और भी हैं
एक हम ही नहीं दुनिया से ख़फ़ा और भी हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
निगाह-ए-अहल-ए-दिल में फ़ाश करती हैं मुझे जैसे
मिरी मजबूरियाँ जिन की प्यास रंज-ए-महरूमी
क़य्यूम नज़र
नज़्म
हाँ सँभल जा अब कि ज़हर-ए-अहल-ए-दिल के आब हैं
कितने तूफ़ान तेरी कश्ती के लिए बे-ताब हैं
जोश मलीहाबादी
नज़्म
मुनव्वर सीना हो जाए फ़रोग़-ए-शम'-ए-उल्फ़त से
दिल-ए-अहल-ए-वतन को भी फ़रोज़ाँ चाहता हूँ मैं
अब्दुल क़य्यूम ज़की औरंगाबादी
नज़्म
जो अहल-ए-दिल को बे-मंज़िल बनाने की हैं तदबीरें
मगर अहल-ए-जहाँ को क्या ख़बर
मोहम्मद तन्वीरुज़्ज़मां
नज़्म
ग़लत हैं नासिया-फ़रसाइयाँ तेरी तलब तेरी
तिरी राहें जुदा हैं अहल-ए-दिल से अहल-ए-हसरत से