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नज़्म
खिल के हँसता है महकता है बिखर जाता है गुल
इक ही दिन में सौ हवादिस से गुज़र जाता है गुल
सदा अम्बालवी
नज़्म
दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
कुछ ऐसे रूप में आया है फ़ित्ना-ए-हाज़िर
तमीज़-ए-दोस्ताँ ओ दुश्मनाँ भी मुश्किल है