aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "duur"
किसी के दूर जाने सेतअ'ल्लुक़ टूट जाने सेकिसी के मान जाने सेकिसी के रूठ जाने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी को आज़माने सेकिसी के आज़माने सेकिसी को याद रखने सेकिसी को भूल जाने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी को छोड़ देने सेकिसी के छोड़ जाने सेना शम्अ' को जलाने सेना शम्अ' को बुझाने सेमुझे अब डर नहीं लगताअकेले मुस्कुराने सेकभी आँसू बहाने सेना इस सारे ज़माने सेहक़ीक़त से फ़साने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी की ना-रसाई सेकिसी की पारसाई सेकिसी की बेवफ़ाई सेकिसी दुख इंतिहाई सेमुझे अब डर नहीं लगताना तो इस पार रहने सेना तो उस पार रहने सेना अपनी ज़िंदगानी सेना इक दिन मौत आने सेमुझे अब डर नहीं लगता
हाँ दिल का दामन फैला हैक्यूँ गोरी का दिल मैला हैहम कब तक पीत के धोके मेंतुम कब तक दूर झरोके मेंकब दीद से दिल को सेरी हो
दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैंतेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराबदश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स ओ ख़ाक तलेखिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब
कि अब तुम याद दिलदाराना आती होशमीम-ए-दूर-माँदा हो
सुनो 'ज़रयून' तुम तो ऐन-ए-अ'यान-ए-हक़ीक़त होनज़र से दूर मंज़र का सर-ओ-सामान-ए-सर्वत होहमारी उम्र का क़िस्सा हिसाब अंदोज़-ए-आनी हैज़मानी ज़द में ज़न की इक गुमान-ए-लाज़िमानी हैगुमाँ ये है कि बाक़ी है बक़ा हर आन फ़ानी हैकहानी सुनने वाले जो भी हैं वो ख़ुद कहानी हैंकहानी कहने वाला इक कहानी की कहानी हैपिया पे ये गदाज़िश ये गुमाँ और ये गिले कैसेसिला-सोज़ी तो मेरा फ़न है फिर इस के सिले कैसे
लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरीज़िंदगी शम्अ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी!दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए!हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए!हो मिरे दम से यूँही मेरे वतन की ज़ीनतजिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगीलोग बे-वज्ह उदासी का सबब पूछेंगेये भी पूछेंगे कि तुम इतनी परेशाँ क्यूँ होजगमगाते हुए लम्हों से गुरेज़ाँ क्यूँ होउँगलियाँ उट्ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएँगेकाँपते हाथों पे भी फ़िक़रे कसे जाएँगेफिर कहेंगे कि हँसी में भी ख़फ़ा होती हैंअब तो 'रूही' की नमाज़ें भी क़ज़ा होती हैंलोग ज़ालिम हैं हर इक बात का तअना देंगेबातों बातों में मिरा ज़िक्र भी ले आएँगेइन की बातों का ज़रा सा भी असर मत लेनावर्ना चेहरे के तअस्सुर से समझ जाएँगेचाहे कुछ भी हो सवालात न करना उन सेमेरे बारे में कोई बात न करना उन सेबात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
जब देख लिया हर शख़्स यहाँ हरजाई हैइस शहर से दूर इक कुटिया हम ने बनाई हैऔर उस कुटिया के माथे पर लिखवाया हैसब माया है
हाँ उम्र का साथ निभाने के थे अहद बहुत पैमान बहुतवो जिन पे भरोसा करने में कुछ सूद नहीं नुक़सान बहुतवो नार ये कह कर दूर हुई 'मजबूरी साजन मजबूरी'ये वहशत से रंजूर हुए और रंजूरी सी रंजूरी?उस रोज़ हमें मालूम हुआ उस शख़्स का मुश्किल समझानाइस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवानागो आग से छाती जलती थी गो आँख से दरिया बहता थाहर एक से दुख नहीं कहता था चुप रहता था ग़म सहता थानादान हैं वो जो छेड़ते हैं इस आलम में नादानों कोउस शख़्स से एक जवाब मिला सब अपनों को बेगानों को'कुछ और कहो तो सुनता हूँ इस बाब में कुछ मत फ़रमाना'इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवानाअब आगे का तहक़ीक़ नहीं गो सुनने को हम सुनते थेउस नार की जो जो बातें थीं उस नार के जो जो क़िस्से थेइक शाम जो उस को बुलवाया कुछ समझाया बेचारे नेउस रात ये क़िस्सा पाक किया कुछ खा ही लिया दुखयारे नेक्या बात हुई किस तौर हुई अख़बार से लोगों ने जानाइस बस्ती के इक कूचे में इक इंशा नाम का दीवाना
जब फ़स्ल कटी तो क्या देखाकुछ दर्द के टूटे गजरे थेकुछ ज़ख़्मी ख़्वाब थे काँटों परकुछ ख़ाकिस्तर से कजरे थेऔर दूर उफ़ुक़ के सागर मेंकुछ डोलते डूबते बजरे थे
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
वही गेसू वही नज़रें वही आरिज़ वही जिस्ममैं जो चाहूँ तो मुझे और भी मिल सकते हैंवो कँवल जिन को कभी उन के लिए खिलना थाउन की नज़रों से बहुत दूर भी खिल सकते हैं
और कुछ देर में जब फिर मिरे तन्हा दिल कोफ़िक्र आ लेगी कि तन्हाई का क्या चारा करेदर्द आएगा दबे पाँव लिए सुर्ख़ चराग़वो जो इक दर्द धड़कता है कहीं दिल से परे
ख़ामोश ज़मीं के सीने में ख़ेमों की तनाबें गड़ने लगींमक्खन सी मुलाएम राहों पर बूटों की ख़राशें पड़ने लगींफ़ौजों के भयानक बैंड तले चर्खों की सदाएँ डूब गईं
निगाह दूर तलक जा के लौट आएगीकरोगे याद तो हर बात याद आएगी
ऐ ज़ुल्म के मातो लब खोलो चुप रहने वालो चुप कब तककुछ हश्र तो उन से उट्ठेगा कुछ दूर तो नाले जाएँगे
दर्द इतना था कि उस रात दिल-ए-वहशी नेहर रग-ए-जाँ से उलझना चाहाहर बुन-ए-मू से टपकना चाहाऔर कहीं दूर तिरे सहन में गोयापत्ता पत्ता मिरे अफ़्सुर्दा लहू में धुल करहुस्न-ए-महताब से आज़ुर्दा नज़र आने लगामेरे वीराना-ए-तन में गोयासारे दुखते हुए रेशों की तनाबें खुल करसिलसिला-वार पता देने लगींरुख़्सत-ए-क़ाफ़िला-ए-शौक़ की तय्यारी काऔर जब याद की बुझती हुई शम्ओं में नज़र आया कहींएक पल आख़िरी लम्हा तिरी दिलदारी कादर्द इतना था कि उस से भी गुज़रना चाहाहम ने चाहा भी मगर दिल न ठहरना चाहा
वो वक़्त मिरी जान बहुत दूर नहीं हैजब दर्द से रुक जाएँगी सब ज़ीस्त की राहेंऔर हद से गुज़र जाएगा अंदोह-ए-निहानीथक जाएँगी तरसी हुई नाकाम निगाहेंछिन जाएँगे मुझ से मिरे आँसू मिरी आहेंछिन जाएगी मुझ से मिरी बे-कार जवानी
सैकड़ों हसन नासिरहैं शिकार नफ़रत केसुब्ह-ओ-शाम लुटते हैंक़ाफ़िले मोहब्बत केजब से काले बाग़ों नेआदमी को घेरा हैमिशअलें करो रौशनदूर तक अँधेरा हैमेरे देस की धरतीप्यार को तरसती हैपत्थरों की बारिश हीइस पे क्यूँ बरसती हैमुल्क को बचाओ भीमुल्क के निगहबानोदस करोड़ इंसानो!बोलने पे पाबंदीसोचने पे ताज़ीरेंपाँव में ग़ुलामी कीआज भी हैं ज़ंजीरेंआज हरफ़-ए-आख़िर हैबात चंद लोगों कीदिन है चंद लोगों कारात चंद लोगों कीउठ के दर्द-मंदों केसुब्ह-ओ-शाम बदलो भीजिस में तुम नहीं शामिलवो निज़ाम बदलो भीदोस्तों को पहचानोदुश्मनों को पहचानोदस करोड़ इंसानो!
ये कैसा इश्क़ है उर्दू ज़बाँ कामज़ा घुलता है लफ़्ज़ों का ज़बाँ परकि जैसे पान में महँगा क़िमाम घुलता हैये कैसा इश्क़ है उर्दू ज़बाँ का....नशा आता है उर्दू बोलने मेंगिलौरी की तरह हैं मुँह लगी सब इस्तेलाहेंलुत्फ़ देती है, हलक़ छूती है उर्दू तो, हलक़ से जैसे मय का घोंट उतरता हैबड़ी अरिस्टोकरेसी है ज़बाँ मेंफ़क़ीरी में नवाबी का मज़ा देती है उर्दूअगरचे मअनी कम होते है उर्दू मेंअल्फ़ाज़ की इफ़रात होती हैमगर फिर भी, बुलंद आवाज़ पढ़िए तो बहुत ही मो'तबर लगती हैं बातेंकहीं कुछ दूर से कानों में पड़ती है अगर उर्दूतो लगता है कि दिन जाड़ों के हैं खिड़की खुली है, धूप अंदर आ रही हैअजब है ये ज़बाँ, उर्दूकभी कहीं सफ़र करते अगर कोई मुसाफ़िर शेर पढ़ दे 'मीर', 'ग़ालिब' कावो चाहे अजनबी हो, यही लगता है वो मेरे वतन का हैबड़ी शाइस्ता लहजे में किसी से उर्दू सुन करक्या नहीं लगता कि एक तहज़ीब की आवाज़ है, उर्दू
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