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नज़्म
सिराज लखनवी
नज़्म
अहमद फ़राज़
नज़्म
मिरे अहल-ए-हर्फ़-ओ-सुख़न-सरा
जो गदागरों में बदल गए
मिरे हम-सफ़ीर थे हीला-जू
किसी और सम्त निकल गए
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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मिरे अहल-ए-हर्फ़-ओ-सुख़न-सरा
जो गदागरों में बदल गए
मिरे हम-सफ़ीर थे हीला-जू
किसी और सम्त निकल गए