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नज़्म
मुझ में ऐ यार मिरे कोई कमालात न देख
मैं तो इस दहर का छोटा सा बशर हूँ जिस ने
विनोद कुमार त्रिपाठी बशर
नज़्म
हर जगह चोरी का चर्चा हर जगह है लूट-मार
दिन-दहाड़े लुट रहा है हर तरफ़ फ़र्द-ए-बशर
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
कहीं ये ख़ूँ से फ़र्द-ए-माल-ओ-ज़र तहरीर करती है
कहीं ये हड्डियाँ चुन कर महल ता'मीर करती है