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नज़्म
कोई अफ़्साना है मुज़्मर या हक़ीक़त या फ़रेब-ए-पुख़्ता-काराँ
मैं नज़र रखता हूँ तुम पर
वली आलम शाहीन
नज़्म
न तूफ़ाँ हो न तूफ़ाँ में ग़रीबों का जहाज़ आए
ख़ुदाया हम फ़रेब-ए-कश्ती-ओ-साहिल से बाज़ आए
क़ैसर अमरावतवी
नज़्म
हुस्न अभी तक दाम-ए-फ़रेब-ए-तफ़रक़ा-ओ-तफ़रीक़ में है
'इश्क़ ख़ुलूस-ए-‘आम का हामिल कल भी था और आज भी है
मासूम शर्क़ी
नज़्म
फ़रेब-ए-बे-ख़ुदी देते हुए बिल्लोर के साग़र
मगर मैं अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ता ही जाता हूँ