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नज़्म
ख़्वाब-ए-गिराँ से ग़ुंचों की आँखें न खुल सकीं
गो शाख़-ए-गुल से नग़्मा बराबर उठा किया
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
फ़र्श-ए-गुल वालो ज़मीं पर लोग महव-ए-ख़्वाब हैं
ख़िरमनों के पासबानो बिजलियाँ बेताब हैं!!
जोश मलीहाबादी
नज़्म
जाम पुर-शोर से गिर जाने दो नाकाम तमन्नाओं की मय
फ़र्श-ए-मय-ख़ाना-ए-उल्फ़त पे उलट दो साग़र
ज़ाहिदा ज़ैदी
नज़्म
ये फ़र्श-ए-आब-ओ-गिल मेरे लिए इक सिलसिला क्यूँ है
परिंदा आसमाँ की नीलगूँ मेहराब के उस पार चाहता हूँ