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नज़्म
उस की गर्मी मिरी साँसों से कोई दूर नहीं
फ़र्श-ए-मख़मल पे बिछी जाती हैं उस की नज़रें
ज़िया जालंधरी
नज़्म
सहर की फूटती किरनें तड़प आई दरीचे से
लिपट कर खेलती हैं मेरे घर के फ़र्श-ए-मख़मल से
सूफ़िया अनजुम ताज
नज़्म
गिरते हैं इक फ़र्श-ए-मख़मल बनाते हैं जिस पर
मिरी आरज़ूओं की परियाँ अजब आन से यूँ रवाँ हैं
मीराजी
नज़्म
जाम पुर-शोर से गिर जाने दो नाकाम तमन्नाओं की मय
फ़र्श-ए-मय-ख़ाना-ए-उल्फ़त पे उलट दो साग़र
ज़ाहिदा ज़ैदी
नज़्म
ये फ़र्श-ए-आब-ओ-गिल मेरे लिए इक सिलसिला क्यूँ है
परिंदा आसमाँ की नीलगूँ मेहराब के उस पार चाहता हूँ