aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "fasaad-e-KHalq"
तुम्हारा अहद अगर उस्तुवार ही होतातो फिर भी दामन-ए-दिल तार तार ही होताख़ुद अपनी ज़ात ही नाख़ुन ख़ुद अपनी ज़ात ही ज़ख़्मख़ुद अपना दिल रग-ए-जाँ और ख़ुद अपना दिल नश्तरफ़साद-ए-ख़ल्क़ भी ख़ुद और फ़साद-ए-ज़ात भी ख़ुदसफ़र का वक़्त भी ख़ुद जंगलों की रात भी ख़ुद
फ़साद-ए-शहर थम गयाफ़ज़ा में बस गई है एक ज़हर-नाक ख़ामुशीहिरास ख़ौफ़ बेबसी
मेरा हर काम हो इंसाँ की भलाई के लिएख़िदमत-ए-ख़ल्क़ करूँ ऐसी सआ'दत दे दे
और शह्र मेंआँखें खुली रखनाबदन को इज़्दिहाम-ए-ख़ल्क़ सेमहफ़ूज़ रखनाहर नफ़स दरकार हैवो भीड़ हैहर्फ़-ए-दु'आ है
चाँदनी की साँवली किरनों में घबराई हुईअनगिनत रूहेंगुज़शता शहरों से भागी हुईअब फ़साद-ए-शहर पे हैरान शश्दरअपनी क़ब्रों परपरिंदों की तरह बैठी हुईऔर उन की आँखें जैसेताक़ मेंगुज़रे ज़मानों के दिए
बुराई की बातों में रक्खा ही क्या हैबदी का नतीजा हमेशा बुरा हैख़ुदा ने तुम्हें आज मौक़ा' दिया हैकरो ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ नेकी कमाओजवानो कोई काम करके दिखाओ
सदा-ए-ख़ुश-ख़िराम थीअदा-ए-दिलबरी लिएमिज़ा से तीर फेंकती हुई मिरी तरफ़ रवाँ-दवाँख़ुदा-गवाह जैसे मरमरीं बदन लिए 'अदम से कोई रौ में होक़तार-दर-क़तार सिंफ़-हा-ए-ख़ल्क़ देखती हुईक़ज़ा भी ठहर कर नज़र बचा के देखने लगीये काएनात 'आशिक़ों के वास्ते बहुत बड़ी नहींमगर ज़रा से फ़ासले को सर किया तो कई हज़ार नूरी साल लग गए
जहाँ आबाद ये नापाक शहरिस्तां नहीं होतेफ़सादी फ़ित्ना-परवर और ज़लील इंसाँ नहीं होतेये इंसाँ हाँ ये हैवाँ बद-तर अज़-शैताँ नहीं होतेफ़साद-ओ-शर जहाँ सोते हैं ख़्वाबों के मज़ारों में!मिरी 'सलमा'! मुझे ले चल तू उन रंगीं नज़ारों में!
ये किस ने आलम-ए-हस्ती किया तह-ओ-बालाशराब-ए-ज़ीस्त को साग़र में मौत के ढालाये किस ने ज़ीस्त के दामन को तार तार कियाज़मीर-ए-वक़्त में पैदा इक इंतिशार कियाये किस ने दौलत-ए-अम्न-ओ-अमाँ को लूट लियाकि बन के राह-नुमा कारवाँ को लूट लियाये किस ने बादा-ए-हस्ती में ज़हर घोला हैफ़साद-ओ-क़हर-ओ-तबाही का बाब खोला हैये किस ने अक़्ल को ईजाद का सिला बख़्शाहरीफ़-ए-मूसा-ए-इमराँ को भी असा बख़्शाबनाया क़ैसर-ओ-नय्यर को हुक्मराँ किस नेचमन के वास्ते ख़ुद मोल ली ख़िज़ाँ किस नेये किस ने ज़ुल्म के बंदों को तेग़-ए-कीं दे दीफ़लक के मश्क़-ए-सितम के लिए ज़मीं दे दीख़िरद को राज़-ए-दरूँ का सुराग़ किस ने दियाशरीर बच्चे को आख़िर चराग़ किस ने दियाबहार से न कहीं ज़ीनत-ए-चमन जाएज़मीं तमाम ये हीरोशीमा न बन जाए
मुझे लिखना था सरशारीमुझे लिखना था दिलदारीमुझे लिखना था अपना हल्फ़-नामाऔर बयान-ए-इस्तिग़ासाबादशाह-ए-वक़्त के मग़रूर ऐवान-ए-अदालत मेंउमडती ख़ल्क़ की मौजूदगी मेंवारदात-ए-क़त्ल-ए-ख़ूबाँ के हक़ाएक़और बयान-ए-ख़ल्क़-ए-बरहम
हवा जारूब-कश थी आसमाँ-आसार तिनकों कीजिसे अपनी सुहुलत के लिए दुनिया... ये तन-आसान दुनिया... इक मुरव्वत मेंहुजूम-ए-ख़ल्क़ कहती हैमिरी आँखें तही गुल-दान की सूरत मुंडेरों परगली से उठने वाली गर्द को तितली बताती हैंये मंज़र मुंजमिद हो कर सफ़र आग़ाज़ करता हैलहू की बर्क़-रफ़्तारी तनाबें खेंच लेती हैये कैसी शाम-ए-शहज़ादीशफ़क़ के फूल थाली में सजाए ज़ीना-ए-शब से उतर आईमें समझा उस से मिलने की घड़ी आईसलाख़ों से लहू फूटा लहू में रौशनी आई
काश मैं एक पेड़ बन जातापेड़ बन कर जहाँ के काम आतारात दिन इक जगह खड़ा रहतागर्मी सर्दी की शिद्दतें सहताख़ूब बारिश में भीग जाता मगरशिकवा हरगिज़ न लाता मैं लब परधूप में लोग मेरे पास आतेमेरे साए में वो सुकूँ पातेछाँव में आ के बैठ जाते परिंदफूल फल पत्तियों से सब मेरीपूरी करते ज़रूरतें अपनीमैं किसी घर में ईंधन ही बनताया इमारत के काम में आताअल-ग़रज़ जिस तरह भी बन पड़ताख़िदमत-ए-ख़ल्क़ में लगा रहता
अगर मैं चीख़ूँमैं अपने दिल की तमाम गहराइयों से चीख़ूँतो काएनाती निज़ाम में क्या ख़लल पड़ेगायही किअंधे कुएँ से इक बाज़-गश्त होगीकहेगी क्यूँ तुम को क्या हुआ है?तुम्ही बड़े आए हो कहीं केये आसमान ओ ज़मींये सूरज ये चाँद तारेतमाम माँ बाप सारे अज्दादशहर के सब शरीफ़-ज़ादेइन्हें भी देखोये सब मुसीबत-ज़दा, मतानत सेबुर्द-बारी में सह रहे हैंतुम्ही में बर्दाश्त की कमी हैअगर मैं चीख़ूँ तोमेरी आवाज़ भी मलामत करेगी मुझ कोवो सब कहेंगेकि कौन ये शोर कर रहा हैहमारी नींदें उचाट कर दींअगर मैं चीख़ूँतो सारा अम्न-ओ-सुकूननज़्म और नस्क़मुझ को ख़िलाफ़-ए-क़ानून दुश्मन-ए-ख़ल्क़ कह करसलीब देगामगर ये चीख़ों-भरा हुआ दिलकिसी भी लम्हेमुझे कहीं ख़ौफ़नाक राहों पे डाल देगासलाह देगाकि ज़ोर से चीख़ोकि जिस्म के साथरूह भी सर्द हो गई फिरतो क्या करोगे
दर्द जिस दिल में हो उस दिल की दवा बन जाऊँकोई बीमार अगर हो तो शिफ़ा बन जाऊँदुख में हिलते हुए लब की मैं दुआ बन जाऊँउफ़ वो आँखें कि हैं बीनाई से महरूम कहींरौशनी जिन में नहीं नूर जिन आँखों में नहींमैं इन आँखों के लिए नूर-ए-ज़िया बन जाऊँहाए वो दिल जो तड़पता हुआ घर से निकलेउफ़ वो आँसू जो किसी दीदा-ए-तर से निकलेमैं उस आँसू के सुखाने को हवा बन जाऊँदूर मंज़िल से अगर राह में थक जाए कोईजब मुसाफ़िर कहीं रस्ते से भटक जाए कोईख़िज़्र का काम करूँ राह-नुमा बन जाऊँउम्र के बोझ से जो लोग दबे जाते हैंना-तवानी से जो हर रोज़ झुके जाते हैंउन ज़ईफ़ों के सहारे को असा बन जाऊँख़िदमत-ए-ख़ल्क़ का हर सम्त में चर्चा कर दूँमादर-ए-हिन्द को जन्नत का नमूना कर दूँघर करे दिल में जो 'अफ़सर' वो सदा बन जाऊँ
महरम-ए-राज़ दिल-नवाज़ है तूनग़्मा-ए-ज़िंदगी का साज़ है तूकहाँ फूलों में ऐसी रानाईजैसी क़ुदरत से तू ने है पाईतेरे दम से है ये जहाँ गुलज़ारतू ने बख़्शी है इस चमन को बहारतू है इक फूल ख़ुशनुमा शादाबमेहर-ओ-मह का है तू ज़मीं पे जवाबतू ने दी इस चमन को रानाईतू ने फूलों को बख़्शी ज़ेबाईक़ाबिल-ए-क़द्र है तिरी हस्तीलोग क्यों तुझ पे करते हैं सख़्तीतू जहाँ में वफ़ा की देवी हैशर्म-ओ-ख़ल्क़-ओ-हया की देवी हैसख़्तियाँ किस क़दर उठाती हैहर्फ़-ए-शिकवा न लब पे लाती हैरौनक़-ए-बज़्म-ए-काएनात है तूऔर सर-चश्मा-ए-हयात है तूतू न होती तो ये जहान-ए-ख़राबहोता दोज़ख़ का इस ज़मीं पे जवाबइतनी मर्दों को दे ख़ुदा तौफ़ीक़क़द्र तेरी करें बना के रफ़ीक़
गरचे पौदा अभी हूँ छोटा साआरज़ू दिल में है मिरे क्या क्याआ ही जाएगी रुत जवानी कीयानी मुझ पर भी शादमानी कीडाली डाली मिरी हरी होगीऔर फल फूल से भरी होगीफ़ैज़ होगा जहाँ में आम मिराख़िदमत-ए-ख़ल्क़ होगा काम मिरासारी चिड़ियों को मैं बुलाऊँगाख़ूब मेवे उन्हें खिलाऊँगाघोंसले मुझ पे वो बनाएँगीराग छेड़ेंगी चहचहाएँगीजो भी आएगा उन का करने शिकारमेरे पत्तों की देखेगा दीवारगर्मियों में मुसाफ़िर आएँगेमेरे साए में चैन पाएँगेबच्चे आएँगे झूला झूलेंगेगीत गा के ख़ुशी में फूलेंगेवो चलाएँगे मुझ पे जब पत्थरइस के बदले मैं इन को दूँगा समरएक ख़्वाहिश है और दिल में बड़ीकाश वो भी करे ख़ुदा पूरीसूख जाऊँ तो लकड़ियों से मिरीख़ूबसूरत सी इक बने कुर्सीउस पे बैठे फ़क़त वही लड़काजिस के सर में हो इल्म का सौदादिल में अपने जो मैं ने ठानी हैउस की ये मुख़्तसर कहानी हैमैं भी बच्चा हूँ तुम भी बच्चे होमैं भी सच्चा हूँ तुम भी सच्चे होक्या बनाया है ज़िंदगी का प्लानमैं तो रखता हूँ तुम से नेक गुमानआज छोटे हो कल जो होगे जवाँकौन से काम तुम करोगे यहाँ
ख़ला की मुश्किलात अपनी जगह क़ाएम थीं और दुनियाउजड़ती भरभरी बंजर ज़मीनों की निशानी थीसितारे सुर्ख़ थे और चाँद सूरज पर अँधेरों का बसेरा थादरख़्तों पर परिंदों की जगह वीरानियों के घोंसले होतेज़मीं की कोख में बस थूर था और ख़ार उगते थेहवा को साँस लेने में बहुत दुश्वारियाँ होतींतो फिर उस नूर वाले ने कोई लौह-ए-अनारा भेज दी शायदअँधेरे रौशनी पे किस तरह ईमान ले आएबलाएँ किस तरह परियों की सूरत में चली आईंये किस नौरल सुवैबा की ख़ुदा तख़्लीक़ कर बैठाये नर्मी दिलबरी शर्म-ओ-हया तख़्लीक़ कर बैठावो नौरल वो सुवैबा जिस की ख़ातिर आसमाँ से रंग उतरे थेवो जिस के दम से दुनिया पर नज़ाकत का वजूद आयाख़ुदा-ए-ख़ल्क़ ने नौरल से पहले ही हवस तख़्लीक़ कर दी थीनज़ाकत तक हवस की दस्तरस तख़्लीक़ कर दी थीहज़ारों साल गुज़रे हैं मगर फ़ितरत नहीं बदलीनिगाहें अब भी भूकी हैं कि जैसे खा ही जाएँगीहवस-ज़ादों ने कैसे नूर से मुँह पर मली कालकहर इक रिश्ता ज़रूरत के मुताबिक़ किस लिए बदलाहवस-ज़ादो बदन-ख़ोरो ज़रा सी शर्म फ़रमाओवो नौरल वो सुवैबा रौशनी का इस्तिआ'रा थीकभी हव्वा कभी मरियम कभी लौह-ए-अनारा थीवो औरत थी
मिरे लहू में ज़ख़्म हैजो सब्ज़ है न सुर्ख़ हैये गीला है न ख़ुश्क हैकि जिस तरह जबीन-ओ-चश्म में कोई सराब हो न आब होन वहशत-ओ-मलाल होकि जैसे इक चराग़ हो बुझा बुझा जला जलान दर्द है न टीस हैकि जैसे वक़्त-ए-जंगचश्म-ए-अस्प में न हैरत-ओ-सवाल होइसी से मेरी ज़िंदगीइसी से सुब्ह-ओ-शाम की ये रौनक़-ओ-शफ़क़ भी हैमिरे तबीब की सलाह मुख़्तलिफ़फ़साद-ए-ख़ून से दयार-ए-जिस्म ही बिखर गयाचराग़-ए-ज़ख़्म से अगर नवाह-ए-जान ज़र्द हो गयाबचेगा क्याकि ज़ख़्म से लहू ही क्याबदन के सारे 'उज़्व मेंफ़िशार-ओ-इंतिशार का हुजूम-ए-बे-महार जब उठेगा तोदिमाग़ को करेगा ला-मकान भीमिरा तबीब कम पढ़ा ग़बी भी है उसे ख़बर नहीं ज़राहकीम अरस्तू ने क्या कहालहू से दिल का सिलसिला अज़ल से हैलहू नहीं तो दिल नहीं जो दिल नहीं लहू नहींदिमाग़ हुक्मराँ ज़रूर हैमगर ये क़ल्ब-ओ-नूर में असीर हैतबीब-ए-ना-मुराद ने जो शाह का ग़ुलाम हैबतौर हुक्म मशवरा दिया मुझेलहू को मैं बदन से ही निकाल दूँये जर्मनी का नुस्ख़ा-ए-जदीद हैखजूर के 'इलाक़े में ये नुस्ख़ा कारगर हुआ
मुसाहिबीन-ए-शाह मुतमइन हुए कि सरफ़राज़ सर-बुरीदा बाज़ुओं समेत शहर की फ़सील पर लटक रहे हैंऔर हर तरफ़ सुकून हैसुकून ही सुकून हैफ़ुग़ान-ए-ख़ल्क़ अहल-ए-ताइफ़ा की नज़्र हो गईमता-ए-सब्र वहशत-ए-दुआ की नज़्र हो गईउमीद-ए-अज्र बे-यक़ीनी-ए-जज़ा की नज़्र हो गईन ए'तिबार-ए-हर्फ़ है न आबरू-ए-ख़ून हैसुकून ही सुकून हैमुसाहिबीन-ए-शाह मुतमइन हुए कि सरफ़राज़ सर-बुरीदा बाज़ुओंसमेत शहर की फ़सील पर लटक रहे हैं और हर तरफ़ सुकून हैसुकून ही सुकून हैख़लीज-ए-इक़्तिदार सरकशों से पाट दी गईजो हाथ आई दौलत-ए-ग़नीम बाँट दी गईतनाब-ए-ख़ेमा-ए-लिसान-ओ-लफ्ज़ काट दी गईफ़ज़ा वो है कि आरज़ू-ए-ख़ैर तक जुनून हैसुकून ही सुकून हैमुसाहिबीन-ए-शाह मुतमइन हुए कि सरफ़राज़ सर-बुरीदा बाज़ुओं समेत शहर की फ़सील पर लटक रहे हैंऔर हर तरफ़ सुकून हैसुकून ही सुकून है
वो देर से इंतिज़ार-गह मेंहर आने वाले को नज़रों नज़रों में नापती थीलिबास की शोख़ी-ओ-जसारतसिंघार की जिद्दत-ओ-महारत के बावजूदइस का गोशा-ए-चशम उम्र की चुग़ली खा रहा थानिगाह नौ-वारिद अजनबी पर पड़ी तो इस तरह मुस्कुरा दीकि जैसे उस की ही मुंतज़िर थीउठी क़रीब आई और बोलीमैं एक मुद्दत से ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ कर रही हूँदुखे दिलों का इलाज करती हूँरंग और रौशनी के शहरों मेंशाम-ए-तन्हाई की दिल अफ़्सुर्दगी से वाक़िफ़ हूँआप अकेले हैं तो कोई इंतिज़ाम कर दूँयहाँ से मैं दूर दूर मुल्कों कोहर तबीअ'त के गाहकों की पसंद का माल भेजती हूँवफ़ा मोहब्बत पुरानी बातें हैं अब इन्हें कौन पूछता हैबड़े बड़े ऊँचे ऊँचे लोगों से रात दिन मेरा वास्ता हैये साहिबान-ए-वक़ार-ओ-नख़वतख़रीदना और बेचना ख़ूब जानते हैंये दाम देते हैं और राहत ख़रीदते हैंबजा है ये भी कि बे-बसों की अना-ओ-इज़्ज़त ख़रीदते हैंमगर जब आते हैं बेचने परतो बे-तकल्लुफ़ ज़मीर तक अपना बेच देते हैंजाह-ओ-सर्वत की मंडियों मेंमैं कह रही थी कि आप चाहें तोआज की रात का कोई इंतिज़ाम कर दूँ
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