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नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
और तुम उस का हाथ हाथों में न ले पाओ
न आँखों ही में झाँको और न दिल की सल्तनत को फ़त्ह कर पाओ
सलीम कौसर
नज़्म
हमेशा सब्ज़ रहेगी वो शाख़-ए-मेहर-अो-वफ़ा
कि जिस के साथ बंधी है दिलों की फ़तह ओ शिकस्त
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
हकीम जाने वो कैसी हिकमत से आश्ना था
शजीअ जाने कि बदर ओ ख़ैबर की फ़त्ह-मंदी का राज़ क्या था
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
सुरूर बाराबंकवी
नज़्म
ज़माने में जिसे हो साहिब-ए-फ़तह-ओ-ज़फ़र होना
ज़रूरी है उसे इल्म-ओ-हुनर से बहरा-वर होना
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
फ़ज़ा गूँजी हुई है सुब्ह के ताज़ा तरानों से
सुरूद-ए-फ़त्ह पर हैं सुर्ख़ फ़ौजें नग़्मा-ज़न जैसे