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नज़्म
बर्फ़ ने बाँधी है दस्तार-ए-फ़ज़ीलत तेरे सर
ख़ंदा-ज़न है जो कुलाह-ए-मेहर-ए-आलम-ताब पर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
गो सुकूँ मुमकिन नहीं आलम में अख़्तर के लिए
फ़ातिहा-ख़्वानी को ये ठहरा है दम भर के लिए
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तू क्या जाने ग़म-ए-शब-हा-ए-फ़ुर्क़त किस को कहते हैं
तिरे इज़हार-ए-उल्फ़त की फ़साहत रात भर की है