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नज़्म
न मिरा मकाँ ही बदल गया न तिरा पता कोई और है
मिरी राह फिर भी है मुख़्तलिफ़ तिरा रास्ता कोई और है
दिलावर फ़िगार
नज़्म
तीर-ए-इफ़्लास से कितनों के कलेजे हैं फ़िगार
कितने सीनों में है घुटती हुई आहों का ग़ुबार
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
हूँ सना-ख़्वाँ मैं 'फ़िगार'-ओ-'साग़र'-ओ-'शहबाज़' का
रुख़ बदल डाला जिन्हों ने शेर के पर्वाज़ का
नश्तर अमरोहवी
नज़्म
आपस की फूट से हो क्यूँ दिल-फ़िगार दोनों
हाँ छोड़ दो ये रंजिश बन जाओ यार दोनों
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
ना-रसाई के कर्ब से दिल-ए-शिकस्ता और पा-फ़िगार राही
कि जिस की हर सई-ए-बे-समर ने