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नज़्म
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँ
फ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
सनानें खींच ली हैं सर-फिरे बाग़ी जवानों ने
तू सामान-ए-जराहत अब उठा लेती तो अच्छा था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
पीते हैं मय के प्याले और देखते हैं जंगले
कितने फिरे हैं बाहर ख़ूबाँ को अपने संग ले
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मची है हर तरफ़ क्या क्या सलोनों की बहार अब तो
हर इक गुल-रू फिरे है राखी बाँधे हाथ में ख़ुश हो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
सर-फिरे कुछ अहल-ए-फ़न मारे हुए तक़दीर के
यूँही बे-समझी में हैं दुश्मन तिरी तहरीर के
ओम प्रकाश बजाज
नज़्म
तो मुझ को हम-नशीं अपना लड़कपन याद आता है
हुआ करती है जब छुट्टी तो चंचल सर-फिरे ख़ुद-सर
शमीम करहानी
नज़्म
तू नज़र न आए सनम अगर तो तड़प उठें ये दिल-ओ-जिगर
तिरी जुस्तुजू में मिरी नज़र फिरे बे-क़रार डगर-डगर