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नज़्म
मिरी तुर्बत पे रक्खा हाथ किस रश्क-ए-मसीहा ने
रग-ए-संग-ए-लहद नब्ज़-ए-तपाँ मालूम होती है
नजमा तसद्दुक़
नज़्म
तुम कहो ज़िंदा गिरफ़्तार-ए-लहद है कि नहीं
हाँ गिरफ़्तार हूँ दो चंद ये कहना है मुझे
मुख़्तार सिद्दीक़ी
नज़्म
ग़ालिब-ए-आतिश-नवा कुंज-ए-लहद में है ख़मोश
सोज़ से दिल के भरे नग़्मात में तासीर कौन
मुनीर वाहिदी
नज़्म
लाहौर में देखा उसे मदफ़ूँ तह-ए-मर्क़द
गर्द-ए-कफ़-ए-पा जिस की कभी काहकशाँ थी