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नज़्म
तितलियाँ अपने परों पर पा के क़ाबू हर तरफ़
सेहन-ए-गुलशन की रविश पर रक़्स फ़रमाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
बंद है कमरे के अंदर गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार
क्या ख़बर आई ख़िज़ाँ कब कब गई फ़स्ल-ए-बहार
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
ज़ुल्म है जौर-ओ-जफ़ा है हर तरफ़ बेदाद है
गर्दिश-ए-दस्त-ए-सितमगर से जहाँ बर्बाद है
टीका राम सुख़न
नज़्म
मैं निकाला जाऊँगा बे-दस्त-ओ-पा और सर खुला
''जितने अर्सा में मिरा लिपटा हुआ बिस्तर खुला''