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नज़्म
सिर्फ़ वो मख़्सूस सीने हैं मिरी आराम-गाह
आरज़ू की तरह रह जाती है जिन में घुट के आह
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
कहीं दम घुट रहा है मुस्कुराते सुर्ख़ फूलों का
कहीं कलियों के सीने में हवा रुक रुक के आती है