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नज़्म
जिन के हर लफ़्ज़ में नश्तर है निगाहों में सिनाँ
कार-ख़ानों में घुटे जाते हैं जिन के अरमाँ
इज़हार मलीहाबादी
नज़्म
गले घुटते हैं या फिर टूटती हैं फाँसियाँ देखें
सर-ओ-दोश इक तरफ़ दार-ओ-रसन की आज़माइश है
फ़ज़लुर्रहमान
नज़्म
जो मिल जाए मैं मावरा-ए-नज़र की झलक पा सकूँ
इस भयानक अँधेरे में घुटते हुए जी को बहला सकूँ
अज़ीज़ तमन्नाई
नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
क्या साज़ जड़ाओ ज़र-ज़ेवर क्या गोटे थान कनारी के
क्या घोड़े ज़ीन सुनहरी के क्या हाथी लाल अमारी के
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ख़ुदा का शुक्र है कि तुम उन से मुख़्तलिफ़ निकले
जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं