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नज़्म
ख़्वाब-ए-गिराँ से ग़ुंचों की आँखें न खुल सकीं
गो शाख़-ए-गुल से नग़्मा बराबर उठा किया
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
वही गुलशन अब इक वीराना-ए-आबाद है गोया
ग़िलाफ़-ए-साज़ में लिपटी हुई फ़रियाद है गोया
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
चमन में जिस से है इज़्न-ए-शगुफ़्त-ए-ग़ुन्चा-ओ-गुल
गुदाज़ क़ल्ब वो बख़्शा है तुझ को क़ुदरत ने
मसूद अख़्तर जमाल
नज़्म
सर-ए-मिज़्गाँ सितारों का चमकना और बिखर जाना
ब-रु-ए-बर्ग-ए-ए-गुल तहरीर अफ़्साना
फ़िरोज़ नातिक़ ख़ुसरो
नज़्म
ज़र्द पत्ता हो गया था रो-ए-पुर-अनवार-ए-गुल
शर्म रख ली तू ने बन कर ग़ाज़ा-ए-रुख़्सार-ए-गुल
हामिद हसन क़ादरी
नज़्म
ख़िज़ाँ तमाम हुई किस हिसाब में लिखिए
बहार-ए-गुल में जो पहुँचे हैं शाख़-ए-गुल को गज़ंद