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नज़्म
ये खेप भरे जो जाता है ये खेप मियाँ मत गिन अपनी
अब कोई घड़ी पल सा'अत में ये खेप बदन की है कफ़नी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
सुलैमाँ सर-ब-ज़ानू तुर्श-रू ग़म-गीं, परेशाँ-मू
जहाँ-गिरी, जहाँ-बानी फ़क़त तर्रार-ए-आहू
नून मीम राशिद
नज़्म
अफ़्लाक पे जब ये लाखों तारे जगमग जगमग करती हैं
जब तारे गिन गिन कर दिल वाले ठंडी साँसें भरते हैं
बहज़ाद लखनवी
नज़्म
इक ग़म-गीं लड़की के चेहरे पर चाँद की ज़र्दी छाई है
जो बर्फ़ गिरी थी इस पे लहू के छींटों की रुशनाई है