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नज़्म
गिरते हैं इक फ़र्श-ए-मख़मल बनाते हैं जिस पर
मिरी आरज़ूओं की परियाँ अजब आन से यूँ रवाँ हैं
मीराजी
नज़्म
ऐसे में जो आँसू गिरते थे गिरते ही सितारे होते थे
जब चाँदनी रातों में हम तुम गंगा के किनारे होते थे