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नज़्म
शाहिद-ए-मज़्मूँ तसद्दुक़ है तिरे अंदाज़ पर
ख़ंदा-ज़न है ग़ुंचा-ए-दिल्ली गुल-ए-शीराज़ पर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
सुब्ह के हाथ में ख़ुर्शीद के साग़र की तरह
शाख़-ए-ख़ूँ-रंग-ए-तमन्ना में गुल-ए-तर की तरह
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
पूछ लो इस से तुम्हारा नाम क्यूँ ताबिंदा है
'डायर'-ए-गुर्ग-ए-दहन-आलूद अब भी ज़िंदा है
जोश मलीहाबादी
नज़्म
यही वादी है वो हमदम जहाँ 'रेहाना' रहती थी
यहीं हम-रंग-ए-गुल-हा-ए-हसीं रहती थी 'रेहाना'