aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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फ़रिश्ते पढ़ते हैं जिस को वो नाम है तेराबड़ी जनाब तिरी फ़ैज़ आम है तेरासितारे इश्क़ के तेरी कशिश से हैं क़ाएमनिज़ाम-ए-मेहर की सूरत निज़ाम है तेरातिरी लहद की ज़ियारत है ज़िंदगी दिल कीमसीह ओ ख़िज़्र से ऊँचा मक़ाम है तेरानिहाँ है तेरी मोहब्बत में रंग-ए-महबूबीबड़ी है शान बड़ा एहतिराम है तेराअगर सियाह दिलम दाग़-ए-लाला-ज़ार-ए-तवामदिगर कुशादा जबीनम गुल-ए-बहार-ए-तवामचमन को छोड़ के निकला हूँ मिस्ल-ए-निकहत-ए-गुलहुआ है सब्र का मंज़ूर इम्तिहाँ मुझ कोचली है ले के वतन के निगार-ख़ाने सेशराब-ए-इल्म की लज़्ज़त कशाँ कशाँ मुझ कोनज़र है अब्र-ए-करम पर दरख़्त-ए-सहरा हूँकिया ख़ुदा ने न मोहताज-ए-बाग़बाँ मुझ कोफ़लक-नशीं सिफ़त-ए-मेहर हूँ ज़माने मेंतिरी दुआ से अता हो वो नर्दबाँ मुझ कोमक़ाम हम-सफ़रों से हो इस क़दर आगेकि समझे मंज़िल-ए-मक़्सूद कारवाँ मुझ कोमिरी ज़बान-ए-क़लम से किसी का दिल न दुखेकिसी से शिकवा न हो ज़ेर-ए-आसमाँ मुझ कोदिलों को चाक करे मिस्ल-ए-शाना जिस का असरतिरी जनाब से ऐसी मिले फ़ुग़ाँ मुझ कोबनाया था जिसे चुन चुन के ख़ार ओ ख़स मैं नेचमन में फिर नज़र आए वो आशियाँ मुझ कोफिर आ रखूँ क़दम-ए-मादर-ओ-पिदर पे जबींकिया जिन्हों ने मोहब्बत का राज़-दाँ मुझ कोवो शम-ए-बारगह-ए-ख़ानदान-ए-मुर्तज़वीरहेगा मिस्ल-ए-हरम जिस का आस्ताँ मुझ कोनफ़स से जिस के खिली मेरी आरज़ू की कलीबनाया जिस की मुरव्वत ने नुक्ता-दाँ मुझ कोदुआ ये कर कि ख़ुदावंद-ए-आसमान-ओ-ज़मींकरे फिर उस की ज़ियारत से शादमाँ मुझ कोवो मेरा यूसुफ़-ए-सानी वो शम-ए-महफ़िल-ए-इश्क़हुई है जिस की उख़ुव्वत क़रार-ए-जाँ मुझ कोजला के जिस की मोहब्बत ने दफ़्तर-ए-मन-ओ-तूहवा-ए-ऐश में पाला किया जवाँ मुझ कोरियाज़-ए-दहर में मानिंद-ए-गुल रहे ख़ंदाँकि है अज़ीज़-तर अज़-जाँ वो जान-ए-जाँ मुझ कोशगुफ़्ता हो के कली दिल की फूल हो जाएये इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर क़ुबूल हो जाए
फ़िक्र-ए-इंसाँ पर तिरी हस्ती से ये रौशन हुआहै पर-ए-मुर्ग़-ए-तख़य्युल की रसाई ता-कुजाथा सरापा रूह तू बज़्म-ए-सुख़न पैकर तिराज़ेब-ए-महफ़िल भी रहा महफ़िल से पिन्हाँ भी रहादीद तेरी आँख को उस हुस्न की मंज़ूर हैबन के सोज़-ए-ज़िंदगी हर शय में जो मस्तूर हैमहफ़िल-ए-हस्ती तिरी बरबत से है सरमाया-दारजिस तरह नद्दी के नग़्मों से सुकूत-ए-कोहसारतेरे फ़िरदौस-ए-तख़य्युल से है क़ुदरत की बहारतेरी किश्त-ए-फ़िक्र से उगते हैं आलम सब्ज़ा-वारज़िंदगी मुज़्मर है तेरी शोख़ी-ए-तहरीर मेंताब-ए-गोयाई से जुम्बिश है लब-ए-तस्वीर मेंनुत्क़ को सौ नाज़ हैं तेरे लब-ए-एजाज़ परमहव-ए-हैरत है सुरय्या रिफ़अत-ए-परवाज़ परशाहिद-ए-मज़्मूँ तसद्दुक़ है तिरे अंदाज़ परख़ंदा-ज़न है ग़ुंचा-ए-दिल्ली गुल-ए-शीराज़ परआह तू उजड़ी हुई दिल्ली में आरामीदा हैगुलशन-ए-वीमर में तेरा हम-नवा ख़्वाबीदा हैलुत्फ़-ए-गोयाई में तेरी हम-सरी मुमकिन नहींहो तख़य्युल का न जब तक फ़िक्र-ए-कामिल हम-नशींहाए अब क्या हो गई हिन्दोस्ताँ की सर-ज़मींआह ऐ नज़्ज़ारा-आमोज़-ए-निगाह-ए-नुक्ता-बींगेसू-ए-उर्दू अभी मिन्नत-पज़ीर-ए-शाना हैशम्अ ये सौदाई-ए-दिल-सोज़ी-ए-परवाना हैऐ जहानाबाद ऐ गहवारा-ए-इल्म-ओ-हुनरहैं सरापा नाला-ए-ख़ामोश तेरे बाम दरज़र्रे ज़र्रे में तिरे ख़्वाबीदा हैं शम्स ओ क़मरयूँ तो पोशीदा हैं तेरी ख़ाक में लाखों गुहरदफ़्न तुझ में कोई फ़ख़्र-ए-रोज़गार ऐसा भी हैतुझ में पिन्हाँ कोई मोती आबदार ऐसा भी है
तुम नहीं आए थे जब तब भी तो मौजूद थे तुमआँख में नूर की और दिल में लहू की सूरतदर्द की लौ की तरह प्यार की ख़ुश्बू की तरहबेवफ़ा वादों की दिलदारी का अंदाज़ लिएतुम नहीं आए थे जब तब भी तो तुम आए थेरात के सीने में महताब के ख़ंजर की तरहसुब्ह के हाथ में ख़ुर्शीद के साग़र की तरहशाख़-ए-ख़ूँ-रंग-ए-तमन्ना में गुल-ए-तर की तरहतुम नहीं आओगे जब तब भी तो तुम आओगेयाद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरतग़म के पैमाना-ए-सर-शार को छलकाते हुएबर्ग-हा-ए-लब-ओ-रुख़्सार को महकाते हुएदिल के बुझते हुए अँगारे को दहकाते हुएज़ुल्फ़-दर-ज़ुल्फ़ बिखर जाएगा फिर रात का रंगशब-ए-तन्हाई में भी लुत्फ़-ए-मुलाक़ात का रंगरोज़ लाएगी सबा कू-ए-सबाहत से पयामरोज़ गाएगी सहर तहनियत-ए-जश्न-ए-फ़िराक़आओ आने की करें बातें कि तुम आए होअब तुम आए हो तो मैं कौन सी शय नज़्र करोकि मिरे पास ब-जुज़ मेहर ओ वफ़ा कुछ भी नहींएक ख़ूँ-गश्ता तमन्ना के सिवा कुछ भी नहीं
कोई महबसों में रसन-ब-पाकोई मक़्तलों में दरीदा तनन किसी के हाथ में शाख़-ए-नयन किसी के लब पे गुल-ए-सुख़न
तुम्हारा हाथ बढ़ा है जो दोस्ती के लिएमिरे लिए है वो इक यार-ए-ग़म-गुसार का हाथवो हाथ शाख़-ए-गुल-ए-गुलशन-ए-तमन्ना हैमहक रहा है मिरे हाथ में बहार का हाथ
अहल-ए-दौलत का सुन चुके तुम हालअब सुनो रुएदाद-ए-अहल-ए-कमालफ़ाज़िलों को है फ़ाज़िलों से इनादपंडितों में पड़े हुए हैं फ़सादहै तबीबों में नोक-झोक सदाएक से एक का है थूक जुदारहने दो अह-ए-इल्म हैं इस तरहपहलवानों में लाग हो जिस तरहईदू वालों का है अगर पट्ठाशेख़ू वालों में जा नहीं सकताशाइरों में भी है यही तकरारख़ुशनवेशों को है यही आज़ारलाख नेकों का क्यूँ न हो इक नेकदेख सकता नहीं है एक को एकइस पे तुर्रा ये है कि अहल-ए-हुनरदूर समझे हुए हैं अपना घरमिली इक गाँठ जिस को हल्दी कीउस ने समझा कि मैं हूँ पंसारीनुस्ख़ा इक तिब का जिस को आता हैसगे-भाई से वो छुपाता हैजिस को आता है फूँकना कुश्ताहै हमारी तरफ़ से वो गूँगाजिस को है कुछ रमल में मालूमातवो नहीं करता सीधे मुँह से बातबाप भाई हो या कि हो बेटाभेद पाता नहीं मुनज्जम काकाम कंदले का जिस को है मालूमहै ज़माने में उस की बुख़्ल की धूमअल-ग़रज़ जिस के पास है कुछ चीज़जान से भी सिवा है उस को अज़ीज़क़ौम पर उन का कुछ नहीं एहसाँउन का होना न होना है यकसाँसब कमालात और हुनर उन केक़ब्र में उन के साथ जाएँगेक़ौम क्या कह के उन को रोएगीनाम पर क्यूँ कि जान खोएगीतरबियत-याफ़्ता हैं जो याँ केख़्वाह बी-ए हों इस में या एम-एभरते हुब्ब-ए-वतन का गो दम हैंपर मुहिब्ब-ए-वतन बहुत कम हैंक़ौम को उन से जो उमीदें थींअब जो देखा तो सब ग़लत निकलींहिस्ट्री उन की और जियोग्राफीसात पर्दे में मुँह दिए है पड़ीबंद उस क़ुफ़्ल में है इल्म उन काजिस की कुंजी का कुछ नहीं है पतालेते हैं अपने दिल ही दिल में मज़ेगोया गूँगे का गुड़ हैं खाए हुएकरते फिरते हैं सैर-ए-गुल तन्हाकोई पास उन के जा नहीं सकताअहल-ए-इंसाफ़ शर्म की जा हैगर नहीं बुख़्ल ये तो फिर क्या हैतुम ने देखा है जो वो सब को दिखाओतुम ने चखा है जो वो सब को चखाओये जो दौलत तुम्हारे पास है आजहम-वतन इस के हैं बहुत मोहताजमुँह को एक इक तुम्हारे है तकताकि निकलता है मुँह से आप के क्याआप शाइस्ता हैं तो अपने लिएकुछ सुलूक अपनी क़ौम से भी किएमेज़ कुर्सी अगर लगाते हैं आपक़ौम से पूछिए तो पुन है न पापमुँडा जूता गर आप को है पसंदक़ौम को इस से फ़ाएदा न गज़ंदक़ौम पर करते हो अगर एहसाँतो दिखाओ कुछ अपना जोश-ए-निहाँकुछ दिनों ऐश में ख़लल डालोपेट में जो है सब उगल डालोइल्म को कर दो कू-ब-कू अर्ज़ांहिन्द को कर दिखाओ इंगलिस्ताँ
मिरी सदा है गुल-ए-शम्-ए-शाम-ए-आज़ादीसुना रहा हूँ दिलों को पयाम आज़ादीलहू वतन के शहीदों का रंग लाया हैउछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादीमुझे बक़ा की ज़रूरत नहीं कि फ़ानी हूँमिरी फ़ना से है पैदा दवाम-ए-आज़ादीजो राज करते हैं जम्हूरियत के पर्दे मेंउन्हें भी है सर-ओ-सौदा-ए-ख़ाम-ए-आज़ादीबनाएँगे नई दुनिया किसान और मज़दूरयही सजाएँगे दीवान-ए-आम-ए-आज़ादीफ़ज़ा में जलते दिलों से धुआँ सा उठता हैअरे ये सुब्ह-ए-ग़ुलामी ये शाम-ए-आज़ादीये महर-ओ-माह ये तारे ये बाम हफ़्त-अफ़्लाकबहुत बुलंद है इन से मक़ाम-ए-आज़ादीफ़ज़ा-ए-शाम-ओ-सहर में शफ़क़ झलकती हैकि जाम में है मय-ए-लाला-फ़ाम-ए-आज़ादीस्याह-ख़ाना-ए-दुनिया की ज़ुल्मतें हैं दो-रंगनिहाँ है सुब्ह-ए-असीरी में शाम-ए-आज़ादीसुकूँ का नाम न ले है वो क़ैद-ए-बे-मीआदहै पय-ब-पय हरकत में क़याम-ए-आज़ादीये कारवान हैं पसमाँदगान-ए-मंज़िल केकि रहरवों में यही हैं इमाम-ए-आज़ादीदिलों में अहल-ए-ज़मीं के है नीव उस की मगरक़ुसूर-ए-ख़ुल्द से ऊँचा है बाम-ए-आज़ादीवहाँ भी ख़ाक-नशीनों ने झंडे गाड़ दिएमिला न अहल-ए-दुवल को मक़ाम-ए-आज़ादीहमारे ज़ोर से ज़ंजीर-ए-तीरगी टूटीहमारा सोज़ है माह-ए-तमाम-ए-आज़ादीतरन्नुम-ए-सहरी दे रहा है जो छुप करहरीफ़-ए-सुब्ह-ए-वतन है ये शाम-ए-आज़ादीहमारे सीने में शोले भड़क रहे हैं 'फ़िराक़'हमारी साँस से रौशन है नाम-ए-आज़ादी
मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतनगुल-पोश तेरी वादियाँफ़रहत-निशाँ राहत-रसाँतेरे चमन-ज़ारों पे हैगुलज़ार-ए-जन्नत का गुमाँहर शाख़ फूलों की छड़ीहर नख़्ल-ए-तूबा है यहाँकौसर के चश्मे जा-ब-जातसनीम हर आब-ए-रवाँहर बर्ग रूह-ए-ताज़गीहर फूल जान-ए-गुल्सिताँहर बाग़ बाग़-ए-दिल-कशीहर बाग़ बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँदिलकश चरागाहें तिरीढोरों के जिन में कारवाँअंजुम-सिफ़त गुलहा-ए-नौहर तख़्ता-ए-गुल आसमाँनक़्श-ए-सुरय्या जा-ब-जाहर हर रविश इक कहकशाँतेरी बहारें दाइमीतेरी बहारें जावेदाँतुझ में है रूह-ए-ज़िंदगीपैहम रवाँ पैहम दवाँदरिया वो तेरे तुंद-ख़ूझीलें वो तेरी बे-कराँशाम-ए-अवध के लब पे हैहुस्न-ए-अज़ल की दास्ताँकहती है राज़-ए-सरमदीसुब्ह-ए-बनारस की ज़बाँउड़ता है हफ़्त-अफ़्लाक परउन कार-ख़ानों का धुआँजिन में हैं लाखों मेहनतीसनअत-गरी के पासबाँतेरी बनारस की ज़रीरश्क-ए-हरीर-ओ-परनियाँबीदर की फ़नकारी में हैंसनअत की सब बारीकियाँअज़्मत तिरे इक़बाल कीतेरे पहाड़ों से अयाँदरियाओं का पानी, तरीतक़्दीस का अंदाज़ा-दाँक्या 'भारतेंदु' ने कियागंगा की लहरों का बयाँ'इक़बाल' और चकबस्त हैंअज़्मत के तेरी नग़्मा-ख़्वाँ'जोश' ओ 'फ़िराक़' ओ 'पंत' हैंतेरे अदब के तर्जुमाँ'तुलसी' ओ 'ख़ुसरव' हैं तेरीतारीफ़ में रत्ब-उल-लिसाँगाते हैं नग़्मा मिल के सबऊँचा रहे तेरा निशाँमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतेरे नज़ारों के नगींदुनिया की ख़ातम में नहींसारे जहाँ में मुंतख़बकश्मीर की अर्ज़-ए-हसींफ़ितरत का रंगीं मोजज़ाफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींहाँ हाँ हमीं अस्त ओ हमींसरसब्ज़ जिस के दश्त हैंजिस के जबल हैं सुर्मगींमेवे ब-कसरत हैं जहाँशीरीं मिसाल-ए-अंग्बींहर ज़ाफ़राँ के फूल मेंअक्स-ए-जमाल-ए-हूरईंवो मालवे की चाँदनीगुम जिस में हों दुनिया-ओ-दींइस ख़ित्ता-ए-नैरंग मेंहर इक फ़ज़ा हुस्न-आफ़रींहर शय में हुस्न-ए-ज़िंदगीदिलकश मकाँ दिलकश ज़मींहर मर्द मर्द-ए-ख़ूब-रूहर एक औरत नाज़नींवो ताज की ख़ुश-पैकरीहर ज़ाविए से दिल-नशींसनअत-गरों के दौर कीइक यादगार-ए-मरमरींहोती है जो हर शाम कोफ़ैज़-ए-शफ़क़ से अहमरींदरिया की मौजों से अलगया इक बत-ए-नज़्ज़ारा-बींया ताएर-ए-नूरी कोईपर्वाज़ करने के क़रींया अहल-ए-दुनिया से अलगइक आबिद-ए-उज़्लत-गुज़ीनक़्श-ए-अजंता की क़समजचता नहीं अर्ज़ंग-ए-चींशान-ए-एलोरा देख करझुकती है आज़र की जबींचित्तौड़ हो या आगराऐसे नहीं क़िलए कहींबुत-गर हो या नक़्क़ाश होतू सब की अज़्मत का अमींमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनदिलकश तिरे दश्त ओ चमनरंगीं तिरे शहर ओ चमनतेरे जवाँ राना जवाँतेरे हसीं गुल पैरहनइक अंजुमन दुनिया है येतू इस में सद्र-ए-अंजुमनतेरे मुग़न्नी ख़ुश-नवाशाएर तिरे शीरीं-सुख़नहर ज़र्रा इक माह-ए-मुबींहर ख़ार रश्क-ए-नस्तरींग़ुंचा तिरे सहरा का हैइक नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतनकंकर हैं तेरे बे-बहापत्थर तिरे लाल-ए-यमनबस्ती से जंगल ख़ूब-तरबाग़ों से हुस्न अफ़रोज़ बनवो मोर वो कब्क-ए-दरीवो चौकड़ी भरते हिरनरंगीं-अदा वो तितलियाँबाँबी में वो नागों के फनवो शेर जिन के नाम सेलरज़े में आए अहरमनखेतों की बरकत से अयाँफ़ैज़ान-ए-रब्ब-ए-ज़ुल-मिननचश्मों के शीरीं आब सेलज़्ज़त-कशाँ काम-ओ-दहनताबिंदा तेरा अहद-ए-नौरौशन तिरा अहद-ए-कुहनकितनों ने तुझ पर कर दियाक़ुर्बान अपना माल धनकितने शहीदों को मिलेतेरे लिए दार-ओ-रसनकितनों को तेरा इश्क़ थाकितनों को थी तेरी लगनतेरे जफ़ा-कश मेहनतीरखते हैं अज़्म-ए-कोहकनतेरे सिपाही सूरमाबे-मिस्ल यक्ता-ए-ज़मन'भीषम' सा जिन में हौसला'अर्जुन' सा जिन में बाँकपनआलिम जो फ़ख़्र-ए-इल्म हैंफ़नकार नाज़ाँ जिन पे फ़न'राय' ओ 'बोस' ओ 'शेरगिल''दिनकर', 'जिगर' 'मैथली-शरण''वलाठोल', 'माहिर', भारती'बच्चन', 'महादेवी', 'सुमन''कृष्णन', 'निराला', 'प्रेम-चंद''टैगोर' ओ 'आज़ाद' ओ 'रमन'मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनखेती तिरी हर इक हरीदिलकश तिरी ख़ुश-मंज़रीतेरी बिसात-ए-ख़ाक केज़र्रे हैं महर-ओ-मुश्तरीझेलम कावेरी नाग वोगंगा की वो गंगोत्रीवो नर्बदा की तमकनतवो शौकत-ए-गोदावरीपाकीज़गी सरजू की वोजमुना की वो ख़ुश-गाैहरीदुल्लर्बा आब-ए-नील-गूँकश्मीर की नीलम-परीदिलकश पपीहे की सदाकोयल की तानें मद-भरीतीतर का वो हक़ सिर्रहुतूती का वो विर्द-ए-हरीसूफ़ी तिरे हर दौर मेंकरते रहे पैग़म्बरी'चिश्ती' ओ 'नानक' से मिलीफ़क़्र-ओ-ग़िना को बरतरीअदल-ए-जहाँगीरी में थीमुज़्मर रेआया-पर्वरीवो नव-रतन जिन से हुईतहज़ीब-ए-दौर-ए-अकबरीरखते थे अफ़्ग़ान-ओ-मुग़लइक सौलत-ए-अस्कंदरीरानाओं के इक़बाल कीहोती है किस से हम-सरीसावंत वो योद्धा तिरेतेरे जियाले वो जरीनीती विदुर की आज तककरती है तेरी रहबरीअब तक है मशहूर-ए-ज़माँ'चाणक्य' की दानिश-वरीवयास और विश्वामित्र सेमुनियों की शान-ए-क़ैसरीपातंजलि ओ साँख सेऋषियों की हिकमत-पर्वरीबख़्शे तुझे इनआम-ए-नौहर दौर चर्ख़-ए-चम्बरीख़ुश-गाैहरी दे आब कोऔर ख़ाक को ख़ुश-जौहरीज़र्रों को महर-अफ़्शानियाँक़तरों को दरिया-गुस्तरीमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतू रहबर-ए-नौ-ए-बशरतू अम्न का पैग़ाम-बरपाले हैं तू ने गोद मेंसाहिब-ख़िरद साहिब-ए-नज़रअफ़ज़ल-तरीं इन सब में हैबापू का नाम-ए-मो'तबरहर लफ़्ज़ जिस का दिल-नशींहर बात जिस की पुर-असरजिस ने लगाया दहर मेंनारा ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तरबे-कार हैं तीर-ओ-सिनाँबे-सूद हैं तेग़-ओ-तबरहिंसा का रस्ता झूट हैहक़ है अहिंसा की डगरदरमाँ है ये हर दर्द काये हर मरज़ का चारा-गरजंगाह-ए-आलम में कोईइस से नहीं बेहतर सिपरकरता हूँ मैं तेरे लिएअब ये दुआ-ए-मुख़्तसररौनक़ पे हों तेरे चमनसरसब्ज़ हों तेरे शजरनख़्ल-ए-उमीद-ए-बेहतरीहर फ़स्ल में हो बारवरकोशिश हो दुनिया में कोईख़ित्ता न हो ज़ेर-ओ-ज़बरतेरा हर इक बासी रहेनेको-सिफ़त नेको-सियरहर ज़न सलीक़ा-मंद होहर मर्द हो साहिब-हुनरजब तक हैं ये अर्ज़ ओ फ़लकजब तक हैं ये शम्स ओ क़मरमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतन
किस ज़बाँ से कह रहे हो आज तुम सौदागरोदहर में इंसानियत के नाम को ऊँचा करोजिस को सब कहते हैं हिटलर भेड़िया है भेड़ियाभेड़िये को मार दो गोली पए-अम्न-ओ-बक़ाबाग़-ए-इंसानी में चलने ही पे है बाद-ए-ख़िज़ाँआदमिय्यत ले रही है हिचकियों पर हिचकियाँहाथ है हिटलर का रख़्श-ए-ख़ुद-सरी की बाग परतेग़ का पानी छिड़क दो जर्मनी की आग परसख़्त हैराँ हूँ कि महफ़िल में तुम्हारी और ये ज़िक्रनौ-ए-इंसानी के मुस्तक़बिल की अब करते हो फ़िक्रजब यहाँ आए थे तुम सौदागरी के वास्तेनौ-इंसानी के मुस्तक़बिल से किया वाक़िफ़ न थेहिन्दियों के जिस्म में क्या रूह-ए-आज़ादी न थीसच बताओ क्या वो इंसानों की आबादी न थीअपने ज़ुल्म-ए-बे-निहायत का फ़साना याद हैकंपनी का फिर वो दौर-ए-मुजरिमाना याद हैलूटते फिरते थे जब तुम कारवाँ-दर-कारवाँसर-बरहना फिर रही थी दौलत-ए-हिन्दोस्ताँदस्त-कारों के अंगूठे काटते फिरते थे तुमसर्द लाशों से गढों को पाटते फिरते थे तुमसनअत-ए-हिन्दोस्ताँ पर मौत थी छाई हुईमौत भी कैसी तुम्हारे हात की लाई हुईअल्लाह अल्लाह किस क़दर इंसाफ़ के तालिब हो आजमीर-जाफ़र की क़सम क्या दुश्मन-ए-हक़ था 'सिराज'क्या अवध की बेगमों का भी सताना याद हैयाद है झाँसी की रानी का ज़माना याद हैहिजरत-ए-सुल्तान-ए-देहली का समाँ भी याद हैशेर-दिल 'टीपू' की ख़ूनीं दास्ताँ भी याद हैतीसरे फ़ाक़े में इक गिरते हुए को थामनेकस के तुम लाए थे सर शाह-ए-ज़फ़र के सामनेयाद तो होगी वो मटिया-बुर्ज की भी दास्ताँअब भी जिस की ख़ाक से उठता है रह रह कर धुआँतुम ने क़ैसर-बाग़ को देखा तो होगा बारहाआज भी आती है जिस से हाए 'अख़्तर' की सदासच कहो क्या हाफ़िज़े में है वो ज़ुल्म-ए-बे-पनाहआज तक रंगून में इक क़ब्र है जिस की गवाहज़ेहन में होगा ये ताज़ा हिन्दियों का दाग़ भीयाद तो होगा तुम्हें जलियानवाला-बाग़ भीपूछ लो इस से तुम्हारा नाम क्यूँ ताबिंदा है'डायर'-ए-गुर्ग-ए-दहन-आलूद अब भी ज़िंदा हैवो 'भगत-सिंह' अब भी जिस के ग़म में दिल नाशाद हैउस की गर्दन में जो डाला था वो फंदा याद हैअहल-ए-आज़ादी रहा करते थे किस हंजार सेपूछ लो ये क़ैद-ख़ानों के दर-ओ-दीवार सेअब भी है महफ़ूज़ जिस पर तनतना सरकार काआज भी गूँजी हुई है जिन में कोड़ों की सदाआज कश्ती अम्न के अमवाज पर खेते हो क्यूँसख़्त हैराँ हूँ कि अब तुम दर्स-ए-हक़ देते हो क्यूँअहल-ए-क़ुव्वत दाम-ए-हक़ में तो कभी आते नहीं''बैंकी'' अख़्लाक़ को ख़तरे में भी लाते नहींलेकिन आज अख़्लाक़ की तल्क़ीन फ़रमाते हो तुमहो न हो अपने में अब क़ुव्वत नहीं पाते हो तुमअहल-ए-हक़ रोशन-नज़र हैं अहल-ए-बातिन कोर हैंये तो हैं अक़वाल उन क़ौमों के जो कमज़ोर हैंआज शायद मंज़िल-ए-क़ुव्वत में तुम रहते नहींजिस की लाठी उस की भैंस अब किस लिए कहते नहींक्या कहा इंसाफ़ है इंसाँ का फ़र्ज़-ए-अव्वलींक्या फ़साद-ओ-ज़ुल्म का अब तुम में कस बाक़ी नहींदेर से बैठे हो नख़्ल-ए-रास्ती की छाँव मेंक्या ख़ुदा-ना-कर्दा कुछ मोच आ गई है पाँव मेंगूँज टापों की न आबादी न वीराने में हैख़ैर तो है अस्प-ए-ताज़ी क्या शिफ़ा-ख़ाने में हैआज कल तो हर नज़र में रहम का अंदाज़ हैकुछ तबीअत क्या नसीब-ए-दुश्मनाँ ना-साज़ हैसाँस क्या उखड़ी कि हक़ के नाम पर मरने लगेनौ-ए-इंसाँ की हवा-ख़्वाही का दम भरने लगेज़ुल्म भूले रागनी इंसाफ़ की गाने लगेलग गई है आग क्या घर में कि चिल्लाने लगेमुजरिमों के वास्ते ज़ेबा नहीं ये शोर-ओ-शैनकल 'यज़ीद' ओ 'शिम्र' थे और आज बनते हो 'हुसैन'ख़ैर ऐ सौदागरो अब है तो बस इस बात मेंवक़्त के फ़रमान के आगे झुका दो गर्दनेंइक कहानी वक़्त लिक्खेगा नए मज़मून कीजिस की सुर्ख़ी को ज़रूरत है तुम्हारे ख़ून कीवक़्त का फ़रमान अपना रुख़ बदल सकता नहींमौत टल सकती है अब फ़रमान टल सकता नहीं
सड़कों पे बे-शुमार गुल-ए-ख़ूँ पड़े हुएपेड़ों की डालियों से तमाशे झड़े हुएकोठों की ममटियों पे हसीं बुत खड़े हुएसुनसान हैं मकान कहीं दर खुला नहींकमरे सजे हुए हैं मगर रास्ता नहींवीराँ है पूरा शहर कोई देखता नहींआवाज़ दे रहा हूँ कोई बोलता नहीं
यहीं हम-रंग-ए-गुल-हा-ए-हसीं रहती थी 'रेहाना'मिसाल-ए-हूर-ए-फ़िरदौस-ए-बरीं रहती थी 'रेहाना'यहीं 'रेहाना' रहती थी यहीं 'रेहाना' रहती थीयहीं वादी है वो हमदम जहाँ 'रेहाना' रहती थी
इल्म ने आज कुरेदे हैं वो ज़ुल्मात के ढेरवक़्त ने जिस पे बिठाए थे फ़ना के पहरेजाग उठे सूर-ए-सराफ़ील से गूँगे बहरेता-अबद जिन के मुक़द्दर में थी दुनिया अंधेरये मगर अज़्मत-ए-इंसाँ है कि तक़दीर के फेर?
मगर न जानेवो रास्ता क्यूँ चुना था मैं नेकि जिस पे ख़ुद से विसाल तक का गुमाँ नहीं है?वो रास्ता क्यूँ चुना था मैं नेवो रुक गया है दिलों के इबहाम के किनारे?वही किनारा कि जिस के आगे गुमाँ का मुमकिनजो तू है मैं हूँ!मगर ये सच है,मैं तुझ को पाने की (ख़ुद को पाने की) आरज़ू में निकल पड़ा थाउस एक मुमकिन की जुस्तुजू मेंजो तू है मैं हूँमैं ऐसे चेहरे को ढूँढता थाजो तू है मैं हूँमैं ऐसी तस्वीर के तआक़ुब में घूमता थाजो तू है मैं हूँ!मैं इस तआक़ुब मेंकितने आग़ाज़ गिन चुका हूँ(में उस से डरता हूँ जो ये कहताहै मुझ को अब कोई डर नहीं है)मैं इस तआक़ुब में कितनी गलियों से,कितने चौकों से,कितने गूँगे मुजस्समों से, गुज़र गया हूँमैं इस तआक़ुब में कितने बाग़ों से,कितनी अंधी शराब रातों से,कितनी बाँहों से,कितनी चाहत के कितने बिफरे समुंदरों सेगुज़र गया हूँमैं कितनी होश ओ अमल की शम्ओं से,कितने ईमाँ के गुम्बदों सेगुज़र गया हूँमैं इस तआक़ुब में कितने आग़ाज़ कितने अंजाम गिन चुका हूँअब इस तआक़ुब में कोई दर हैन कोई आता हुआ ज़मानाहर एक मंज़िल जो रह गई हैफ़क़त गुज़रता हुआ फ़सानातमाम रस्ते, तमाम बूझे सवाल, बे-वज़्न हो चुके हैंजवाब, तारीख़ रूप धारेबस अपनी तकरार कर रहे हैंजवाब हम हैं जवाब हम हैंहमें यक़ीं है जवाब हम हैंयक़ीं को कैसे यक़ीं से दोहरा रहे हैं कैसे!मगर वो सब आप अपनी ज़िद हैंतमाम, जैसे गुमाँ का मुमकिनजो तू है मैं हूँ!
लोग गूँगे हैं बयाबाँ में अज़ाँ कैसे होलोग क़ातिल हैं इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ कैसे होलोग पत्थर हैं तो एहसास-ए-ज़ियाँ कैसे होकिस को फ़ुर्सत है जो पूछे कि मियाँ कैसे हो
मू-क़लम, साज़ गुल-ए-ताज़ा थिरकते पाँवबात कहने के बहाने हैं बहुतआदमी किस से मगर बात करे?बात जब हीला-ए-तक़रीब-ए-मुलाक़ात न होऔर रसाई कि हमेशा से है कोताह-कमंदबात की ग़ायत-ए-ग़ायात न हो!
तह-ए-नुजूम, कहीं चाँदनी के दामन मेंहुजूम-ए-शौक़ से इक दिल है बे-क़रार अभीख़ुमार-ए-ख़्वाब से लबरेज़ अहमरीं आँखेंसफ़ेद रुख़ पे परेशान 'अम्बरीं आँखेंछलक रही है जवानी हर इक बुन-ए-मू सेरवाँ हो बर्ग-ए-गुल-ए-तर से जैसे सैल-ए-शमीमज़िया-ए-मह में दमकता है रंग-ए-पैराहनअदा-ए-इज्ज़ से आँचल उड़ा रही है नसीमदराज़ क़द की लचक से गुदाज़ पैदा हैअदा-ए-नाज़ से रंग-ए-नियाज़ पैदा हैउदास आँखों में ख़ामोश इल्तिजाएँ हैंदिल-ए-हज़ीं में कई जाँ-ब-लब दु'आएँ हैंतह-ए-नुजूम कहीं चाँदनी के दामन मेंकिसी का हुस्न है मसरूफ़-ए-इंतिज़ार अभीकहीं ख़याल के आबाद-कर्दा गुलशन मेंहै एक गुल कि है ना-वाक़िफ़-ए-बहार अभी
तुम मुझे पहन सकते होकि मैं ने अपने आप कोधुले हुए कपड़े की तरहकई दफ़अ' निचोड़ा हैकई दफ़अ' सुखाया हैतुम मुझे चबा सकते होकि मैं चूसने वाली गोली की तरहअपनी मिठास की तह घुला चुकी हूँतुम मुझे रुला सकते होकि मैं ने अपने आप को क़त्ल कर केअपने ख़ून को पानी पानी कर केआँखों में झील बना ली हैतुम मुझे भून सकते होकि मेरी बोटी बोटीतड़प तड़प करज़िंदगी की हर साँस कोअलविदा'अ कह चुकी हैतुम मुझे मसल सकते होकि रोटी सूखने से पहलेख़स्ता हो कर भुर्भुरी हो जाती हैतुम मुझे ता'वीज़ की तरहघोल कर पी जाओतो मैं कलीसाओं में बजती घंटियों मेंइसी तरह तुलूअ' होती रहूँगीजैसे गुल-ए-आफ़्ताब
अब बज़्म-ए-सुख़न सोहबत-ए-लब-सोख़्तगाँ हैअब हल्क़ा-ए-मय ताइफ़ा-ए-बे-तलबाँ हैघर रहिए तो वीरानी-ए-दिल खाने को आवेरह चलिए तो हर गाम पे ग़ौग़ा-ए-सगाँ हैपैवंद-ए-रह-ए-कूचा-ए-ज़र चश्म-ए-ग़ज़ालाँपाबोस-ए-हवस अफ़सर-ए-शमशाद-क़दाँ हैयाँ अहल-ए-जुनूँ यक-ब-दिगर दस्त-ओ-गिरेबाँवाँ जैश-ए-हवस तेग़-ब-कफ़ दरपा-ए-जाँ हैअब साहब-ए-इंसाफ़ है ख़ुद तालिब-ए-इंसाफ़मोहर उस की है मीज़ान ब-दस्त-ए-दिगराँ हैहम सहल-तलब कौन से फ़रहाद थे लेकिनअब शहर में तेरे कोई हम सा भी कहाँ है
तेरी नशात-ख़ेज़ फ़ज़ा-ए-जवाँ की ख़ैरगुलहा-ए-रंग-ओ-बू के हसीं कारवाँ की ख़ैर
मुझे न तोड़ो कि मैं गुल-ए-तर सहीमगर ओस के बजाए लहू में तर हूँमुझे न मारोमैं ज़िंदगी के जमाल और गहमा-गहमियों का पयामबर हूँमुझे बचाओ कि मैं ज़मीं हूँकरोड़ों करोड़ों की काएनात-ए-बसीत में सिर्फ़ मैं ही हूँजो ख़ुदा का घर हूँ
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