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नज़्म
क़ुमरियाँ मीठे सुरों के साज़ ले कर आ गईं
बुलबुलें मिल-जुल के आज़ादी के गुन गाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ख़्वाब-ए-गिराँ से ग़ुंचों की आँखें न खुल सकीं
गो शाख़-ए-गुल से नग़्मा बराबर उठा किया
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
ब-ज़ेर-ए-शाख़-ए-गुल-ए-शगुफ़्ता मैं सूरत-ए-शम्अ' चुप खड़ी हूँ
फ़ज़ा में कोयल की इक सदा है
बिलक़ीस जमाल बरेलवी
नज़्म
बे-ख़ुदी चारों तरफ़ छाई है रंगीं है चमन
झूमते हैं लहलहाते हैं गुल-ओ-सर्व-ओ-समन
चौधरी कलिका प्रसाद
नज़्म
गुल-ओ-बुलबुल से हट कर भी कभी देखा है फ़ितरत को
गुल-ओ-बुलबुल बजा लेकिन चमन में ख़ार भी तो है