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नज़्म
ऐ गुल-ए-तर किस क़दर दिलकश है नज़्ज़ारा तिरा
हामिल-ए-हुस्न-ए-अज़ल है क़ल्ब-ए-सी-पारा तिरा
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
बहार-ए-हुस्न जवाँ-मर्ग सूरत-ए-गुल-ए-तर
मिसाल-ए-ख़ार मगर उम्र-ए-दर्द-ए-इश्क़ दराज़
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
या बाग़ में खिलता है दम-ए-सुब्ह गुल-ए-तर
क्या क्या उसे होते नहीं ए'ज़ाज़ मयस्सर
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
तू खिलाता है नए गुल जो रवाँ होता है
रंग ये शाख़-ए-गुल-ए-तर में कहाँ होता है
मास्टर बासित बिस्वानी
नज़्म
क़स्र-ए-तौहीद का इक बुर्ज-ए-मुनव्वर तू है
गुलशन-ए-हक़ के लिए बू-ए-गुल-ए-तर तू है
मोअज़्ज़म अली खां
नज़्म
हूँ गुल-ए-तर कोई या ख़ार-ए-मुग़ीलाँ हूँ मैं
दर्द-ए-सर हूँ कि किसी दर्द का दरमाँ हूँ मैं
ख्वाजा मंज़र हसन मंज़र
नज़्म
ग़ुंचा-ए-अहद-ए-तरब ही मिल चुका अब ख़ाक में
ख़ाक-ए-गुलशन अब गुल-ए-तर बन के इतराई तो क्या
जोश मलीहाबादी
नज़्म
सुब्ह के हाथ में ख़ुर्शीद के साग़र की तरह
शाख़-ए-ख़ूँ-रंग-ए-तमन्ना में गुल-ए-तर की तरह
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
क़ुमरियाँ मीठे सुरों के साज़ ले कर आ गईं
बुलबुलें मिल-जुल के आज़ादी के गुन गाने लगीं