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नज़्म
जो बात है वो शोख़ी-ए-गुलदस्ता-ए-चमन
जो लफ़्ज़ है बहार-ए-कफ़-ए-गुल-फ़रोश है
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
तू खिलाता है नए गुल जो रवाँ होता है
रंग ये शाख़-ए-गुल-ए-तर में कहाँ होता है
मास्टर बासित बिस्वानी
नज़्म
ऐ सती ऐ जल्वा-गाह-ए-शोला-ए-तनवीर-ए-हुस्न
पाक-दामानी का नक़्शा है तिरी तस्वीर-ए-हुस्न
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
है अब तक सेहर सा छाया तिरी जादू-नवाई का
दिल-ए-उर्दू पे अब तक दाग़ है तेरी जुदाई का
मयकश अकबराबादी
नज़्म
हाए वो पहली नज़र वो उस की आँखों के पयाम
वो लजा कर मुस्कुरा कर दस्त-ए-नाज़ुक से सलाम
हसरत जयपुरी
नज़्म
शाख़-ए-गुल से फ़र्श पर बुलबुल तड़प कर गिर गई
ये गिरा नीचे कि मुझ से चश्म-ए-साक़ी फिर गई
अमजद नजमी
नज़्म
गुलशन-ए-आलम में जब तशरीफ़ लाती है बहार
रंग-ओ-बू के हुस्न क्या क्या कुछ दिखाती है बहार
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
रौशनी निखरी हुई है कोहर के उस पार देख
तीरगी सहमी हुई है कोहर के उस पार देख