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नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
गरचे इक मिट्टी के पैकर में निहाँ है ज़िंदगी
क़ुल्ज़ुम-ए-हस्ती से तो उभरा है मानिंद-ए-हबाब
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये इस्तिग़्ना है पानी में निगूँ रखता है साग़र को
तुझे भी चाहिए मिस्ल-ए-हबाब-ए-आबजू रहना
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
लौह भी तू, क़लम भी तू, तेरा वजूद अल-किताब!
गुम्बद-ए-आबगीना-रंग तेरे मुहीत में हबाब!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जन्नत-ए-नज़ारा है नक़्श-ए-हवा बाला-ए-आब
मौज-ए-मुज़्तर तोड़ कर ता'मीर करती है हबाब
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
कमाल अहमद सिद्दीक़ी
नज़्म
जैसे बासी फूल की बू जैसे पतझड़ का गुलाब
जैसे दिन में चाँद तारे जैसे दरिया में हबाब