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नज़्म
तू शनासा-ए-ख़राश-ए-उक़्दा-ए-मुश्किल नहीं
ऐ गुल-ए-रंगीं तिरे पहलू में शायद दिल नहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़ुद अपने चारागर से हाल-ए-सई-ए-रायगाँ कहूँ
कहूँ कि क्यूँ फ़सुर्दगी है ख़ेमा-ज़न बहार में
शाहिद मलिक
नज़्म
सच है असरार-ए-हक़ीक़त का ख़ज़ाना तू है
हाल-ओ-मुस्तक़बिल-ओ-माज़ी का ज़माना तू है
बिस्मिल इलाहाबादी
नज़्म
टुकड़े होता है जिगर देहली के सदमे सुन के 'ऐश'
और दिल फटता है सुन कर हाल-ए-ज़ार-ए-लखनऊ
हकीम आग़ा जान ऐश
नज़्म
ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-'गाँधी' तफ़्सीर-ए-हाल-ए-'नेहरू'
'आज़ाद' की रियाज़त 'सरदार' की तगापू
तिलोकचंद महरूम
नज़्म
हज़ारों मर्द-ए-मैदाँ ख़ून पानी एक करते हैं
रह-ए-मुश्किल-तलब से तब कहीं आसाँ गुज़रते हैं
शातिर हकीमी
नज़्म
सफ़्हा-ए-दिल से मिटाती अहद-ए-माज़ी के नुक़ूश
हाल ओ मुस्तक़बिल के दिलकश ख़्वाब दिखलाती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जहान-ए-आरज़ू में अब भी हाल-ओ-क़ाल तेरा है
सुख़न की मुम्लिकत में आज तक इक़बाल तेरा है