aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "halla"
न अब हम साथ सैर-ए-गुल करेंगेन अब मिल कर सर-ए-मक़्तल चलेंगेहदीस-ए-दिल-बराँ बाहम करेंगेन ख़ून-ए-दिल से शरह-ए-ग़म करेंगेन लैला-ए-सुख़न की दोस्त-दारीन गम-हा-ए-वतन पर अश्क-बारीसुनेंगे नग़्मा-ए-ज़ंजीर मिल करन शब भर मिल के छलकाएँगे साग़रब-नाम-ए-शाहिद-ए-नाज़ुक-ख़यालाँब-याद-ए-मस्ती-ए-चश्म-ए-ग़ज़ालाँब-नाम-ए-इम्बिसात-ए-बज़्म-ए-रिंदाँब-याद-ए-कुल्फ़त-ए-अय्याम-ए-ज़िंदाँसबा और उस का अंदाज़-ए-तकल्लुमसहर और उस का आग़ाज़-ए-तबस्सुमफ़ज़ा में एक हाला सा जहाँ हैयही तो मसनद-ए-पीर-ए-मुग़ाँ हैसहर-गह अब उसी के नाम साक़ीकरें इत्माम-ए-दौर जाम साक़ीबिसात-ए-बादा-ओ-मीना उठा लोबढ़ा दो शम-ए-महफ़िल बज़्म वालोपियो अब एक जाम-ए-अल-विदाईपियो और पी के साग़र तोड़ डालो
अब तो कुछ ऐसा लगता हैसारा जग मुझ से छोटा हैआँखें भी मिरी बोझल बोझलशानों पर भी कुछ रक्खा हैकातिब-ए-वक़्त ने जाते जातेचेहरे पर कुछ लिख सा दिया हैआईने में चेहरा खोलेदेख रही हूँ क्या लिख्खा हैलिख्खा है तिरे रूप का हालाऔर किसी के गिर्द सजा हैलिख्खा है ज़ुल्फ़ों का दो-शालाऔर किसी ने ओढ़ लिया हैलिख्खा है आँखों का पियालाकहीं कहीं से टूट रहा हैपढ़ कर मुसहफ़-ए-रुख़ की इबारतदिल को इत्मीनान हुआ हैरूह तलक सरशार है मेरीआईना हैरान हुआ हैउस को शायद इल्म नहीं हैमेरा दामन अब भी भरा हैजो रखना था रक्खे हुए हूँजो देना था बाँट दिया है
ज़मीं का हुस्न सब्ज़ा हैमगर अब सब्ज़ पते ज़र्द हो कर झड़ते जाते हैंबहारें दैर से आती हैंजुगनू है न तितली ख़ुशबुओं... से रंग रूठे हैंजहाँ जंगल हुआ करते थे और बारिश धनक ले कर उतरती थीजहाँ बरसात में कोयल, पपीहे चहचहाते थेवहाँ अब ख़ाक उड़ती हैदरख़्तों की कमी से आ गई है धूप में शिद्दतफ़ज़ा का मेहरबाँ हाला पिघलता जा रहा हैआसमाँ ताँबे में ढलता जा रहा हैइस लिए बे-मेहर मौसम अब सताते हैंधुएँ के, गर्द के, आलूदगी के, शोर के मौसमगली, कूचों, घरों में कार-ख़ानों में बस अबसड़क पर शोर बहता हैसुनाई ही नहीं देता हमारा दिल जो कहता हैमोहब्बत का परिंदा आज-कल ख़ामोश रहता हैपरिंदे प्यास में डूबे हैं और पानी नहीं पीतेकि दरियाओं की शिरयानों में अब शफ़्फ़ाफ़ पानी की जगह आलूदगी का ज़हर हैहमें जब बहर ओ बर की हुक्मरानी दी गई है तो ये हम को सोचना होगाज़मीनों, पानियों, माहौल की बीमारियों का कोई मुदावा हैकहीं इन का सबब हम तो नहीं बनते?सबब कोई भी हो आख़िर मुदावा कुछ तो करना हैये तस्वीर-ए-जहाँ है रंग इस में हम को भरना है
हरीम-ए-महमिल में आ गया हूँ सलाम ले लोसलाम ले लो कि मैं तुम्हारा अमीन-ए-क़ासिद ख़जिल मुसाफ़िर अज़ा की वादी से लौट आयामैं लौट आया मगर सरासीमा इस तरह सेकि पिछले क़दमों पलट के देखा न गुज़रे रस्तों के फ़ासलों कोजहाँ पे मेरे निशान-ए-पा अब थके थके से गिरे पड़े थेहरीम-ए-महमिल में वो सफ़ीर-ए-नवेद-परवरजिसे ज़माने के पस्त ओ बाला ने इतने क़िस्से पढ़ा दिए थेजो पहले क़रनों की तीरगी को उजाल देतेतुम्हें ख़बर हैये मेरा सीना क़दीम अहराम में अकेला वो इक हरम थाअज़ीम राज़ों के कोहना ताबूत जिस की कड़ियों में बस रहे थेउन्हीं हवाओं का डर नहीं थान सहरा-ज़ादों के नस्ली का ही उन की गिर्द-ए-ख़बर को पहुँचेहरीम-ए-महमिल में वो अमानत का पासबाँ हूँजो चर्म-ए-आहू के नर्म काग़ज़ पे लिक्खे नामे को ले के निकलावही कि जिस के सवार होने को तुम ने बख़्शा जहाज़-ए-सहरातवील राहों में ख़ाली मश्कों का बार ले कर हज़ार सदियाँ सफ़र में गर्दांकहीं सराबों की बहती चाँदी कहीं चटानों की सख़्त क़ाशेंमयान-ए-राह-ए-सफ़र खड़े थे जकड़ने वाले नज़र के लोभीमगर न भटका भटकने वालाजो दम लिया तो अज़ा में जा करहरीम-ए-महमिल सुनो फ़साने जो सुन सको तोमैं चलते चलते सफ़र के आख़िर पे ऐसी वादी में जा के ठहराऔर उस पे गुज़रे हरीस लम्हों के उन निशानों को देख आयाजहाँ के नक़्शे बिगड़ गए हैंजहाँ के तबक़े उलट गए हैंवहाँ की फ़सलें ज़क़्क़ूम की हैंहवाएँ काली हैं राख उड़ कर खंडर में ऐसे फुँकारती हैकि जैसे अज़दर चहार जानिब से जबड़े खोले ग़दर मचातेज़मीं पे कीना निकालते होंकसीफ़ ज़हरों की थैलियों को ग़ज़ब से बाहर उछालते होंमुहीब साए में देवताओं का रक़्स जारी थाटूटे हाथों की हड्डियों से वो दोहल-ए-बातिल को पीटते थेज़ईफ़ कव्वों ने अहल-ए-क़र्या की क़ब्रें खोदींतू उन के नाख़ुन नहीफ़ पंजों से झड़ के ऐसे बिखर रहे थेचकोंदारों ने चबा के फेंके हों जैसे हड्डी के ख़ुश्क रेज़ेहरीम-ए-महमिल वही वो मंज़िल थी जिस के सीने पे मैं तुम्हारी नज़र से पहुँचा उठाए मेहर ओ वफ़ा के नामेवहीं पे बैठा था सर-ब-ज़ानू तुम्हारा महरमखंडर के बोसीदा पत्थरों पर हज़ीन ओ ग़मगींवहीं पे बैठा थाक़त्ल-नामों के महज़रों को वो पढ़ रहा थाजो पस्तियों के कोताह हाथों ने उस की क़िस्मत में लिख दिए थेहरीम-ए-महमिल मैं अपने नाक़ा से नीचे उतरा तो मैं ने देखा कि उस की आँखें ख़मोश ओ वीराँग़ुबार-ए-सहरा मिज़ा पे लर्ज़ां था रेत दीदों में उड़ रही थीमगर शराफ़त की एक लौ थी कि उस के चेहरे पे नर्म हाला किए हुए थीवो मेरे लहजे को जानता थाहज़ार मंज़िल की दूरियों के सताए क़ासिद के उखड़े क़दमों की चाप सुनते ही उठ खड़ा थादयार-ए-वहशत में बस रहा थापे तेरी साँसों के ज़ेर-ओ-बम से उठी हरारत से आश्ना थावो कह रहा था यहाँ से जाओ कि याँ ख़राबों के कार-ख़ाने हैंरोज़ ओ शब के जो सिलसिले हैं खुले ख़सारों की मंडियाँ हैंवो डर रहा था तुम्हारा क़ासिद कहीं ख़सारों में बट न जाएहरीम-ए-महमिल मैं क्या बताऊँ वहीं पे खोया था मेरा नाक़ाफ़क़त ख़राबे के चंद लम्हे ही उस के गूदे को खा गए थेउसी मक़ाम-ए-तिलिस्म-गर में वो उस्तख़्वानों में ढल गया थाजहाँ पे बिखरा पड़ा था पहले तुम्हारे महरम का अस्प-ए-ताज़ीऔर अब वो नाक़ा के उस्तुख़्वाँ भीतुम्हारे महरम के अस्प-ए-ताज़ी के उस्तख़्वानों में मिल गए हैंहरीम-ए-महमिल वही वो पत्थर थे जिन पे रक्खे थे मैं ने मेहर ओ वफ़ा के नामेजहाँ पे ज़िंदा रुतों में बाँधे थे तुम ने पैमान ओ अहद अपनेमगर वो पत्थर कि अब अजाइब की कारगह हैंतुम्हारे नामे की उस इबारत को खा गए हैंशिफ़ा के हाथों से जिस को तुम ने रक़म किया थासो अब न नाक़ा न कोई नामा न ले के आया जवाब-ए-नामामैं ना-मुराद ओ ख़जिल मुसाफ़िरमगर तुम्हारा अमीन क़ासिद अज़ा की वादी से लौट आयाऔर उस नजीब ओ करीम महरम-ए-वफ़ा के पैकर को देख आयाजो आने वाले दिनों की घड़ियाँ अबद की साँसों से गिन रहा है
अब कहाँ जमुना तिरी मौजों की मस्ताना वो चालअब कहाँ पानी के झरने और वो लुत्फ़-ए-बर्शगालअब कहाँ छोटा सा वो राधा का कुंज-ए-ख़ुश-गवारअब कहाँ वो आह मथुरा तेरे फूलों की बहारअब कहाँ वो बंसी वाले की अदा-ए-जाँ-नवाज़अब कहाँ वो आह मुरली की सदा-ए-जाँ-नवाज़अब कहाँ वो ख़ल्वत-ए-राज़-ओ-नियाज़-ए-हुस्न-ओ-इश्क़बे-सदा ज़ेर-ए-ज़मीं हैं आह साज़-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ओ तलव्वुन-केश ओ काफ़िर-अदा और दूँ-शिआ'रतू ने बदले रंग लाखों आह वज़-ए-रोज़गारख़ाक उठ कर आह सर पर दामन-ए-साहिल उड़ाटुकड़े टुकड़े कर जिगर को पारा-हा-ए-दिल उड़ासोज़िश-ए-ग़म से पिघल जा आह ऐ रेग-ए-रवाँज़र्रे ज़र्रे में तेरे तस्वीर-ए-इबरत है निहाँअब कहाँ वो कुंज-ए-दिल-कश अब कहाँ राधा का ऐशहै ब-रंग-ए-ख़ंदा-ए-गुल बे-बक़ा दुनिया का ऐश
जो तू तस्वीर करता हैजो मैं तहरीर करता हूँन तेरा है न मेरा हैमगर अपना है ये जब तकइसे पढ़ने में कितनी देर लगती हैअभी माहौल को चारों तरफ़ सेहब्स के सहरा ने घेरा हैमगर कब तकहवा चलने में कितनी देर लगती हैकोई ज़ंजीर है शायद हमारे पाँव मेंऔर राह में काफ़ी अंधेरा हैमगर कब तकदिया जलने में कितनी देर लगती हैहवाएँ बादबानों से उलझती और कहीं नाक़ा-सवारों कोकोई पैग़ाम देती शाम के आँचल को थामेसाहिलों की सम्त आती हैंपरिंदे दाएरों में उड़ते फिरतेअब्र की चादर में लिपटेरंग बरसातेफ़ज़ाओं में सफ़र की दास्ताँ लिखतेठिकानों की तरफ़ जाते हुएमंज़र को अपने अक्स में तब्दील करते हैंअचानक सर-फिरी मौजेंमुझे छू कर गुज़र जाती हैंऔर मैं अपने तलवों से निकलती सनसनाती रीत की सरगोशियाँमहसूस करता हूँवही मैं हूँ वही अस्बाब-ए-वहशत हैं वही साहिलवही तू है वही हँसती हुई आँखेंतिरी आँखों में रंगों और ख़्वाबों के जज़ीरेजगमगाते हैंसर-ए-मिज़्गाँ रुपहली साअ'तों के इस्तिआ'रे मुस्कुराते हैंहँसी महताब बनती हैफिर इस महताब के चारों तरफ़ आवाज़ का हाला उभरता हैऔर इस हाले में तेरी उँगलियाँनादीदा मंज़र को तिलिस्म-ए-ख़्वाब से आज़ाद करती हैंतिरे हाथों की जुम्बिशधूप छाँव से धनक तरतीब दे करख़ाली तस्वीरों में ख़द्द-ओ-ख़ाल को आबाद करती हैतिरी पलकें झपकती हैंसितारे से सितारा आन मिलता हैकि जैसे शाम होते हीसुबुक आसार लहरों मेंकिनारे से किनारा आन मिलता हैये जो कुछ हैबहुत ही ख़ूबसूरत हैमगर उस के लिए हैजो ये सब महसूस करता हैतुझे मालूम भी हो जाए तो क्या फ़र्क़ पड़ता हैअभी दिन का थका हारा मुसाफ़िर धूप के खे़मे समेटेदूर पानी में उतरने के लिएबे-ताब है देखोये नीला आसमाँअपनी गराँ ख़्वाबी में ख़ुद ग़र्क़ाब है देखोन जाने क्योंसमुंदर देखने वालों कोसूरज डूबने का ख़ौफ़ रहता हैकोई है जिस को इस्म-ए-आब आता होकिनारों की तरह हर लम्हा कट गिरता होज़ेर-ए-आब आता होसमुंदर आसमाँ की राहदारी हैमगर इस राहदारी तक पहुँचने का कोई रस्ताबड़ी मुश्किल से मिलता हैये इस्म-ए-आबसाहिल पर खड़े नज़्ज़ारा-बीनों की समझ में किस तरह आएकि ये तो डूबने वालों पे भीमुश्किल से खुलता हैमगर कब तकइसे खुलने में कितनी देर लगती है
आमाजगह-ए-नूर है कोहसार-ए-हिमालाहै ग़ैरत-ए-सद-तूर ये भारत का शिवालाकोहसार नहीं ताज-ए-वतन अम्न का हालासहबा-ए-मोहब्बत का छलकता हुआ प्यालाकश्मीर हिमाला का धड़कता हुआ दिल हैइस वादी का हर फूल महकता हुआ दिल हैइस वादी की तारीख़ उख़ुव्वत का फ़सानाइस वादी का हर नग़्मा मोहब्बत का तरानाइस वादी का हर ज़र्रा मआ'नी का ख़ज़ानाइस वादी की तहज़ीब ने देखा है ज़मानाये वादी-ए-गुल आज भी गुलज़ार-ए-इरम हैइस वादी का हर फूल बहारों का सनम है
तुम उन सारी औरतों से ज़ियादा ख़ूबसूरत होजिन्हों ने मेरे ख़यालात पर शो'लों का एक हाला सा बनाए रक्खाऔर जिन की मोहब्बत का बोझ बर्दाश्त करते हुए मेरे क़दम तुम तक आ पहुँचेतुम्हारा चेहरा भले मेरी नज़रों से गुरेज़ाँ रहा मेरी आँखें रौशन हैंउस चमकीले ग्लेशीयर की तरह जो धूप में दूर से नज़र आ जाएयही वो लम्हा है जो वक़्त के समुंदर में जज़्ब हुआ तो उसे अपनी वुसअ'त का अंदाज़ा हुआयही लम्हा जब मौसमों की दुनिया में दाख़िल हुआ तो ख़िज़ाँ को बहार से अफ़ज़ल क़रार दिया गयामुझे पता है तुम्हारे कान रोज़-ए-अव्वल से अब तक के शाइ'रों की ला-यानी तक़रीरों से भरे हुए हैंतुम्हारा दिल अन-गिनत आशिक़ों के बोसीदा जज़्बों से मुतअस्सिरा सर-ज़मीन हैलेकिन यक़ीन करोइस काएनात की हर शय और हर वो शय जिस से मिल कर ये काएनात बनी हैक़ाएम रहने के लिए तुम्हारे वजूद का सहारा लेती हैतुम्हारे वजूद के एहसास का सहारा लेती हैमैं भी सिर्फ़ तुम्हें महसूस ही कर सकता हूँतुम से बात नहीं कर सकतालेकिन वो लोग जो तुम से हम-कलाम होने की आस पे इस दुनिया में आए हैंजिन के ज़ेहन अभी तक तुम्हारी आँखों के साहिलों से ना-आश्ना हैंवो जुलूसों की शक्ल में तुम्हारी तरफ़ आएँगे और आख़िर-कार ख़ाली हाथ लौट जाएँगेमेरी नज़्में उन के लिए मिशअल-ए-राह हैंऔर ये ख़ामोश अलमिया उन्हें हर जहान में सुर्ख़-रू कर सकता हैशर्त ये है कि मैं किसी बहाने तुम्हारे बारे में लिखता रहूँ
कभी सोचा भी है तुम नेतुम्हारी ज़ात के अंदरउस एक एहसास के अंदरतुम्हारी रूह से हो करतुम्हारी नब्ज़ मेंधड़कन मेंइन आती जाती साँसों मेंकभी मद्धम हवाओं मेंकभी सुनसान रस्तों मेंकोई जुगनू चमकता हैऔर उस की रौशनी में तुमअचानक खो से जाते होकभी ख़ुशबू की सूरत मेंरग-ए-जाँ मेंशह-ए-रग मेंवो यूँ तहलील होता हैनज़र कुछ भी नहीं आतामगर जब कोरे काग़ज़ परक़लम को हाथ में ले करग़ज़ल कहने को होते होतो वो मानूस सी ख़ुशबूतुम्हारे गिर्द एक हाला बनाती हैमुक़द्दस दाएरे में क़ैद करती हैतो वो अल्फ़ाज़ को काग़ज़ पेमोती से चमकते हैंइसी मानूस सी ख़ुशबू सेजाने क्यूँ महकते हैंतुम्हारे ज़ेहन और दिल मेंसुकूँ सा फैल जाता हैमगर तुम कब ये समझोगेमोअ'त्तर कर रही है जोतुम्हारी रूह में बस करवो तुम में ज़म हुई है जोतुम्हीं में रहना चाहती है
सुनने वालों को धड़कती हुई तन्हाई मेंकौन दर आता है चुपके से तमन्ना बन करकिस की आवाज़ हवाओं की सुबुक लहरों पररक़्स करती नज़र आती है तमाशा बन करकौन लफ़्ज़ों को अता करता है तस्वीर का हुस्नकौन दिल में उतर आता है मसीहा बन करकिस की धड़कन में है किरदारों के दिल की धड़कनकौन उभर आता है महताब का हाला बन करकितने ज़ेहनों के उफ़ुक़ कितने दिलों के अफ़्लाकतीरगी में भी फ़रोज़ाँ हैं उजाला बन करकितने अन-जानों की तस्कीन-ए-समाअत के लिएअपनी आवाज़ के जादू से ये रस घोलते हैंसरसराते हुए लम्हों की सुबुक-रफ़्तारीकह रही है कि ये तूफ़ानों में पर तौलते हैंकोई भी रूप हो बहरूप बदल कर ये लोगपेच-दर-पेच फ़सानों की गिरह खोलते हैंवो शहनशह हो कि दरयूज़ा-गर-ए-राह-ए-हयातअपने किरदार के औसाफ़ लिए
अपने जूड़े में सजाए हुए बारीक सा चाँदनूर की शाम फिर आई है चराग़ाँ करनेझिलमिलाते हुए तारों का है इक हाला सारौशनी उतरी है तज्दीद-ए-गुलिस्ताँ करने
देख कभी तो मौसम-ए-गुल कोपतझड़ की आवाज़ों मेंऔर कभी तू पर्बत बन जाऔर कभी बह सागर मेंसहराओं में तन्हा चलऔर हँसता जा गुलज़ारों मेंपत्थर से उगा ले फूलों कोख़ारों में शीरीनी भर देरोती शबनम ढलता सूरजसाँझ की सुंदर बेला भीसुब्ह का तारा चाँद का हालाहर मौसम अलबेला भी
मुन्नू चुन्नू फ़री ज़रीबढ़े जाओ पढ़े जाओखेले जाओ खाए जाओडाल हो कि पात होसुब्ह हो कि रात होज़िंदगी की बात होखेले जाओ खाए जाओलप शप लप शपहू हा हूखेले जाओ खाए जाओहल्ला-गुल्ला लाए जाओमुन्नू चुन्नू फ़री ज़रीबढ़े जाओ पढ़े जाओरूम शाम चीनएक दो तीनकाफ़ सीन शीनसब सबक़ सुनाए जाओखेले जाओ खाए जाओलप शप लप शपहू हा हूहल्ला-गुल्ला लाए जाओमुन्नू चुन्नू फ़री ज़रीबढ़े जाओ पढ़े जाओशोख़ गीत गाए जाओछन छन छनबंसरी बजाए जाओछम छम छममीम मुस्कुराए जाओजीम जगमगाए जाओछन छन छनछम छम छमधम धम धमलप शप लप शपहू हा हूखेले जाओ खाए जाओहल्ला-गुल्ला लाए जाओ
मिरा दिल कुछ डूब रहा हैजब से मैं नेनम पलकों की ओस में डूबीडूबी सी इक नज़्म पढ़ी हैचुप चुप बैठी सोच रही हूँतुम ने आख़िर ये क्यों सोचातुम तन्हा होमेरी आँख का सारा अफ़्सूँमेरा कोमल कोमल सायानर्म हवा में शामिल हो केपास तुम्हारे न आया क्याचुप चुप बैठी सोच रही हूँतुम ने आख़िर ये क्या लिक्खाटूटा-फूटा एक घरौंदाजाने कब का बिखर चुका हूँअपनी रूह के अँधियारों मेंउतर चुका हूँतुम हो साहबनूर का हालामाँग की अफ़्शाँचंदन मालामेरे शाइ'रज़िंदा रहनामेरे शाइ'र ज़िंदा रहना
टोपी जनेऊ टीका माला छाप तिलक की झूटी हालाहैं ये सब बाज़ार की चीज़ें नक़ली और बेकार की चीज़ेंतन मन में गर कोढ़ हुआ है कब उस को रेशम ने ढका हैफीका है हर एक लिबास दिल में अगर नहीं विश्वासकाली सफ़ेद अगर हैं नज़रें जीवन पे लगती हैं क़ैदेंफीके फीके चाँद सितारे इन्द्र-धनुष के रंग भी सारेऐसा है पर मेरा घरजिस में नहीं दीवार या दरकिरनों का साया पड़ता हैइंसाँ बस इंसाँ रहता हैमेरा घर है रूह मिरीरस्ता मंज़िल सभी वही
मोहब्बतहमारे दिलों में अक्सर उभरती हैउस से लुत्फ़-अंदोज़ होते रहोपड़ोसियों का ख़ुलूसएक फूल हैउस की महक में तुम्हारा भी हिस्सा हैरिश्ता एक तअ'ल्लुक़ हैऔर तअ'ल्लुक़हमें ज़िंदा रहने में मदद देता हैजज़्बे चाँद का हाला हैंउन्हें महसूस करोअपनी उँगलियों की पोरों सेउन्हें सहलाते रहोएहतियात सेसलीक़े सेजज़्बों को ख़ुर्चो मतक़लई उतर जाएगी
माया ने सपने में देखाउस की कोख में सतरंगी दरिया चढ़ता थाउस के उजले पानी मेंपूरन-माशी का साया थाचाँद बदन के अंदर उतराले कर इक देव-मालामाया के सुंदर चेहरे परकिन भेदों का हालासुन री मायातेरा सपना सच्चा होगातेरी गोद में इक दिन चाँद सा बेटा होगावो जग का अन-दाता होगालेकिन उस के अपने तन परगेरुआ चोलाऔर हाथों में कासा होगादरिया की सीपी के अंदरला'ल छुपा अनमोलमाया रानी समझ न पाएउन शब्दों के बोल
आज जिस वक़्त मुझे तुम ने जगाया अम्माँअपने और नींद के पहलू से उठाया अम्माँआसमाँ कमली था ओढ़े हुए काली कालीताज़गी और सफ़ेदी से फ़ज़ा थी ख़ालीन अंधेरा ही था शब का न उजाला दिन कारात के गिर्द नज़र आता था हाला दिन काएक बुलंदी की कड़क पस्ती को धुँदलाती थीदिल हिलाती हुई आवाज़ सुनी जाती थीसुब्ह हर चार तरफ़ रोती हुई फिरती थीअपना मुँह आँसुओं से धोती हुई फिरती थीजैसे नन्हा सा मैं बेटा हूँ तुम्हारा अम्माँऐसे ही सुब्ह का इक लाल है प्यारा अम्माँजैसे मैं खेलने जाता हूँ बहुत दूर कहींऐसे ही शर्क़ में है आज वो मस्तूर कहीं
आँधी थी तूफ़ान था क्या थामेरी मेज़ पे कौन आया थाकैमल इंक पड़ी है उल्टीगुल-दानों में रेत भरी हैकुर्सी की टाँगें तिरछी हैंफ़ाइल में तितली नत्थी हैटाइमपीस का शीशा टूटामेज़-पोश पर काले धब्बेकटे हुए अख़बार के फोटोलेटर-पैड में काग़ज़ आधेटोपी ग़ाएब है शेफर कीकम हैं एल्बम के नौ पन्ने'अदनान' और 'ज़मन' कहते हैंऐमन टॉफ़ी ढूँड रहे थे'हमरा' 'समरा' नाच रही थीं'फ़ैज़ी' मार रहे थे छक्केमेज़ पर हल्ला बोलने वालेथे मेरे ही प्यारे बचे
हाल-ए-ख़ुर्द ओ कलाँ मेंउम्र भरछोटा बड़ा करने के चक्कर मेंबंधी रहती हैं नज़रेंएक क़ुब्बा-दार मंज़र मेंअज़ल से जानती हैंबुलबुला सीपुतलियों की सर्द मेहराबेंजब इस गुम्बद-नुमाशफ़्फ़ाफ़ शीशे से गुज़र करएक मरकज़ परशुआएँ जम्अ होंगीसामने जो चीज़ होगीजल उठेगी!!
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