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नज़्म
नक़ाहत ख़्वाब में भी जिस्म-ए-इंसाँ के न पास आए
न दामन तक कभी मौज-ए-हवा-ए-रंज-ओ-यास आए
उफ़ुक़ लखनवी
नज़्म
मुझे यक़ीं है कि मौज-ए-हवा में है जादू
वो राग छेड़ गई है नसीम-ए-नर्म-ख़िराम
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
तू सुने तो मौज-ए-हवा भी राग की तान है
तू सुने तो पात भी फूल भी किसी गुप्त गीत के बोल हैं
ज़िया जालंधरी
नज़्म
मुंतशिर कर के फ़ज़ा में जा-ब-जा चिंगारियाँ
दामन-ए-मौज-ए-हवा में फूल बरसाती हुई