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नज़्म
खिल के हँसता है महकता है बिखर जाता है गुल
इक ही दिन में सौ हवादिस से गुज़र जाता है गुल
सदा अम्बालवी
नज़्म
ये आराम-देह बिस्तर पर हम से हम-बिसतरी करते हैं
और कभी हमारी आँवल नाल से चिपक जाते हैं
अज़रा अब्बास
नज़्म
थक जाती है और मिरी आँखों से बहने लग जाती है
बिस्तर के नीचे छुप कर आहें भरती है