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नज़्म
देखता क्यूँ नहीं तेरे बाबा के बालों में खुजली है और उँगलियाँ झड़ चुकी हैं
हिसाब-ए-शब-ओ-रोज़ करते हुए
जावेद अनवर
नज़्म
क़ीमत जो टाँग की है लगा देगी फिर छलांग
''मुझ से मिरे गुनह का हिसाब ऐ ख़ुदा न मांग''
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
मुंतशिर होंगे ये औराक़-ए-किताब-ए-रंग-ओ-बू
चाक कर देगी ख़िज़ाँ आख़िर नक़ाब-ए-रंग-ओ-बू
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
कसीर वादे क़लील उम्रें
अबस हिसाब-ओ-शुमार उस का जो गोश्त इस साल नाख़ुनों से जुदा हुआ है